
प्रतिभा पाण्डेय “प्रति” चेन्नई
चलो ज़िंदगी में आज किरदारों का
आदान-प्रदान करते हैं,
कुछ तुझसे लेते हैं, कुछ किसी का
आत्मसात करते हैं।
बेमौसम की बरसात भी
कभी-कभी बहुत खलती है।
पक्ष किसी का लेकर आज,
तेरे साथ पक्षपात करते हैं।
कभी प्रसन्न, कभी तनाव देती हो,
रोने के बाद ही क्यों लगाव देती हो?
सहनशीलता का अभाव होने पर,
घाव कुरेदकर ही फिर घाव देती हो?
खो रहे वे अपने, हक़दार जो थे,
नींद गायब आँखों से, जो रातों के हक़दार थे।
हिस्सेदारी आज नाच-पार्टियों में बँट गई,
खो गए रिश्ते महकदार जो थे।
ऐ ज़िंदगी! परास्त किसको कर रही?
पत्थर से सिर मार, ख़ुद ही तो रो रही।
झाँक अपने अंदर, क्या है तेरा किरदार?
तू तो अपने को ही दर्द बेहिसाब दे रही।
चल, एक बार कर ले इश्क़ ख़ुद से,
जीवित, जीवंत हो जाएगी सबसे।
न दुर्व्यवहार, न दुश्वारियाँ पनपेंगी,
चहुँ ओर प्रेम ही प्रेम दिखेगा तब से।
