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श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम…

कृष्ण की बाँसुरी और मधुर संगीत की प्रतीकात्मक छवि बाँसुरी की तान में प्रेम, प्रकृति और कृष्ण की अलौकिक अनुभूति।
vijya dalmiya

विजया डालमिया, हैदराबाद

“संगीत जब गीत बनकर लबों पर छा जाता है,
चुपके से कोई मीत बनकर साथ मेरे गुनगुनाता है।”

प्रकृति आपकी सबसे करीबी साथी है, जो आपके भीतर उतरकर आपको भीतर तक तर कर देती है। प्रकृति जब किसी के खोखलेपन को अपने स्वर देती है, तो वह बाँसुरी कहलाती है और जहाँ बाँसुरी का ज़िक्र हो, वहाँ कृष्ण स्वयं-ब-खुद चले आते हैं।

कहते हैं, जब कृष्ण बाँसुरी बजाते थे, तो बादल भी झूमकर मंद-मंद गरजने लगते थे, मानो उनकी तान के साथ ताल मिला रहे हों। प्रकृति जब किसी के साथ इस तरह जुड़ती है, तो वे पल अद्भुत हो जाते हैं। बाँसुरी की तान हमें वही अलौकिक अनुभूति कराती है और हम सोचने लगते हैं कहाँ गई वह बाँसुरी, जो हर घड़ी राधा का नाम पुकारती थी? जिसकी तान सुनकर गोपियाँ दौड़ी चली आती थीं और जो हर दिल को अपने सुरों से हर लेती थी।

आज वही बाँसुरी जैसे इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्रों की चकाचौंध में कहीं पीछे छूट गई है।

हमारे पुराने ज़माने के संगीतकारों ने बाँसुरी की धुन से गीतों को सजीव बनाया और प्रकृति की खूबसूरती को सुरों में उतारा। बिरहा हो या खुशी, दुख हो या मायूसी, दोस्ती हो या प्रेम—हर भाव को जब बाँसुरी की धुन में पिरोया गया, तो गीत अमर हो गए।

आइए, नज़र डालते हैं कुछ ऐसे ही सुमधुर गीतों पर, जिन्हें शायद आप भी आज तक नहीं भूले होंगे।

फिल्म ‘सूरत और सीरत’ का गीत

“बहुत दिया देने वाले ने तुझको…”

इसमें बाँसुरी के प्रयोग ने गीत को एक अलग ही मुकाम दिया।

फिल्म ‘सहेली’ का

“जिस दिल में बसा था प्यार तेरा…”

दर्द में डूबी बाँसुरी की धुन के साथ यह गीत सीधे दिल में उतरता चला गया।

फिल्म ‘तीसरी कसम’ का

“दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई…”

और फिर ‘हीर रांझा’ का

“मिलो न तुम तो हम घबराएँ…”

या फिल्म ‘प्रेम पर्वत’ का—

“यह दिल और उनकी निगाहों के साए…”

सुनते ही मन प्रकृति के खूबसूरत नज़ारों से जुड़ने लगता है।

‘सफ़र’ का

“जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे…”

इस गीत में बाँसुरी ने जो जादू बिखेरा है, वह अद्भुत है।

‘बसंत बहार’ का

“मैं पिया तेरी, तू माने या न माने…”

और

“किसी राह में, किसी मोड़ पर,
कहीं चल न देना तू छोड़कर…”

इस गीत को कर्णप्रिय बनाने में बाँसुरी की मीठी तान का अपना ही जादू है।

फिल्म ‘अभिमान’ का—

“पिया बिन, पिया बिन, बाजे ना बाजे ना…”

वाला गीत भला कौन भूल सकता है?

बाँसुरी की बात हो और राजेंद्र कुमार की फिल्म ‘गीत’ याद न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। फिल्म के लगभग हर गीत में बाँसुरी को प्रमुखता दी गई और परिणाम सामने था—गीत एक से बढ़कर एक और बेहद लोकप्रिय।

इसी क्रम में फिल्म ‘हीरो’ के गीतों में भी बाँसुरी की मधुर धुन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

बाँसुरी की तान के साथ जब ध्यान जुड़ जाता है, तो वह हमें इस दुनिया से दूर एक ऐसी एकात्मक, अलौकिक दुनिया में ले जाती है, जहाँ कुछ पल के लिए सिर्फ़ हम होते हैं और हमारे भीतर गूँजती उसकी तान।

लेकिन आज मन बार-बार पूछता है

कहाँ गई वह माधुरी?
कहाँ गई वह बाँसुरी?

क्या वह कृष्ण की गलियों में कहीं अब भी राधा का नाम पुकार रही है, या आधुनिक संगीत के शोर में उसकी वह मीठी तान कहीं खो गई है?

शायद बाँसुरी आज भी वहीं है…

बस, उसे सुनने वाला मन कहीं खो गया है।

One thought on “श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम…”

  1. यह कलम की ताकत ही है कि लेखिका ने बाँसुरी ही को केंद्र में रखकर आलेख सृजित कर दिया है।

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