
सुनीता माथुर, पुणे
मैं सुनीता और मेरी दोस्त नीता बचपन से ही साथ-साथ पले-बढ़े। स्कूल की शिक्षा के बाद हम दोनों कॉलेज में आ गए। दोनों के कॉलेज अलग थे और विषय भी अलग थे, पर दोस्ती इतनी गहरी थी कि हम दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह पाते थे।
जब भी समय मिलता, हम दोनों एक-दूसरे से मिलते, एक-दूसरे को कहानियाँ सुनाते, अपनी रिश्तेदारियों की बातें करते और कभी-कभी साथ बैठकर पढ़ाई भी करते थे। हमारे घर पास-पास थे, इसलिए मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी।
नीता के पापा हम दोनों की जोड़ी देखकर हमेशा यही कहते थे, “तुम दोनों तो जुड़वाँ हो।” खास बात यह थी कि हम दोनों को एक ही चीज़ पसंद आती थी। हमारे घर वाले भी मज़ाक में कहते थे कि दोनों की शादी एक ही मंडप में कर देंगे।
कभी-कभी किसी बात पर हम दोनों नाराज़ भी हो जाते थे और आपस में लड़ाई भी हो जाती थी, लेकिन एक-दूसरे के बिना रह नहीं पाते थे। थोड़ी ही देर में फिर से दोस्ती हो जाती थी।
हम दोनों का संस्कृत विषय एक ही था। संस्कृत हम दोनों को थोड़ी कठिन लगती थी। उसकी पढ़ाई के लिए हमारी दीदी ने एक संस्कृत के सर को हम दोनों को पढ़ाने के लिए लगा दिया। हम दोनों पढ़ते कम थे और शरारतें ज़्यादा करते थे। उन सर को भी हम बहुत परेशान करते थे। मुझे आज भी याद है, वह सर इतने परेशान हो गए कि हमारी ट्यूशन छोड़कर ही चले गए। आज भी वह बातें याद आती हैं तो हँसी आने लगती है।
नीता के पापा हँसी-मज़ाक में कहते थे, “कहीं तुम दोनों को एक ही लड़का पसंद आ गया, तो शादी कैसे होगी?”
देखते-देखते हमारी शिक्षा भी पूरी हो गई और जब शादी हुई, तो सचमुच हम दोनों की शादी एक ही तारीख को हुई।
शादी के बाद भी हम दोनों मिलते रहे। हम दोनों के ही दो-दो बेटे हैं। उसके भी दो बेटे हैं और मेरे भी दो बेटे हैं।
स्कूल, यानी बचपन से लेकर आज तक हमारा साथ बरकरार है। समय-समय पर हम दोनों आज भी मिलते रहते हैं। हमारे परिवार वाले आज भी हमारी दोस्ती को देखकर कहते हैं कि यह दोस्ती सचमुच अटूट है। “बचपन से पचपन” और उससे भी आगे आज तक हमारा साथ बरकरार है और मरते दम तक हमारी दोस्ती कभी नहीं टूटेगी।
“यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे,
तोड़ेंगे दम मगर,
एक-दूसरे का साथ न छोड़ेंगे।”
यही बात हम दोनों के मुँह से हमेशा निकलती है और हमारे परिवार वाले सुनीता और नीता की इस जोड़ी को सलाम करते हैं।

मित्रता हर रिश्ते से बढ़कर होती हे,,