अल्फाज़ नहीं मिलते

नमिता गुप्ता ‘श्री ‘

रुहों के तरसने से अल्फाज नहीं मिलते।
हर शख्स परेशां है एहसास नहीं खिलते।।

खामोशियों को इतना अब और न बढाना ,
अश्कों के समंदर में परवाज नहीं उड़ते।।

दिल की इन दीवारों पे, लिखा है नाम तेरा ,
जब जी में चाहें पढ़ लो एजाज नहीं करते।

ये दर्द मुहब्बत का रह-रह के कशिश जारी,
दिल तो मेरा नगीना पुखराज नहीं जड़ते।

खामोश इबादत का इक दिन तो नाम होगा,
फिर न कभी ये कहना सुर,साज नही सजते।

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