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विजयादशमी पर जलते रावण के पुतले के सामने आत्ममंथन करता व्यक्ति

जलते पुतले, बढ़ते रावण

विजयादशमी केवल रावण का पुतला जलाने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें दूर करने का अवसर भी है। यह कविता लोभ, अहंकार, छल, अन्याय और टूटते विश्वास पर सवाल उठाते हुए सच्चे विजयादशमी पर्व का अर्थ समझाती है। संदेश स्पष्ट है जब तक मन का रावण जीवित है, तब तक वास्तविक विजय अधूरी है।

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रावण दहन

यह लेख रावण दहन की पौराणिक कथा को जीवंत और संवादात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि रावण केवल एक राक्षस नहीं बल्कि विद्वान और शिवभक्त था, पर अहंकार और लालच के कारण उसका संहार निश्चित था। लंका युद्ध के समय देवी दुर्गा की पूजा और हनुमानजी की चतुरता से रावण का यज्ञ विफल हुआ और उसका संहार सुनिश्चित हुआ। इस कथा के माध्यम से विजया दशमी केवल पुतला जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बन जाती है।

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