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भजन : हे माता कहो क्या त्रुटि हुई

इस भजन में एक भक्त अपनी माता से प्रकट पश्चाताप और सवाल उठाता है — “हे माता, कहो क्या त्रुटि हुई, मुझसे हुआ क्या पाप?” वह दिन-रात माता की सेवा में लगा रहता है, अपने स्वाभिमान और कर्तव्य के बीच उलझा हुआ। भजन में पत्नी की असहायता, आत्म-संदेह और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का मिश्रण दिखाई देता है। हर पंक्ति में उसके हृदय की पीड़ा, पछतावा और भक्ति स्पष्ट है, जबकि माता और देवताओं के प्रति उसका समर्पण उसकी आस्था को उजागर करता है। यह भजन पश्चाताप और विश्वास के बीच की संवेदनशील यात्रा का प्रतीक है।

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कहाँ गए वो लोग

पुराने समय में लोग आपसी मान-सम्मान और पश्चाताप की भावना से भरे रहते थे। जब भी बात मान की आ जाती, तो वे तुरंत झुक जाते और मेल कर लेते। भाई आपस में चाहे कितना भी झगड़ लेते, लेकिन मातृ प्रेम के कारण तुरत ही एक हो जाते और थोड़ी देर रूठकर वापस घर लौट आते।

उस दौर में यदि पड़ोस की दीवारें भी खड़ी हो जातीं, तो लोग उचक-उचक कर झांकते और चूल्हा जलता देखकर आग मांग लेते। गलती हो जाने पर दिन-रात प्रायश्चित करके खुद को सुधारने का प्रयास करते। काली रातों में जब गीदड़ गुर्राते और कोई हल्की सी आवाज़ भी आती, तो गाँव के लोग तुरंत चौकन्ने होकर प्रहरी बन जाते।

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