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बाई की पुरानी पेटी और बाबूजी की पेटी में सहेजी बचपन की यादें

दो पेटियाँ, आधी सदी की यादें

दिवाली की सफाई में खुलती बाई की पेटी और बाबूजी की पेटी केवल पुराना सामान नहीं, बल्कि बचपन, माता-पिता के स्नेह और आधी सदी पुरानी यादों का खजाना हैं। इन पेटियों से जुड़ा यह संस्मरण बीते समय और परिवार की अनमोल स्मृतियों को फिर से जीवंत करता है।

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रंगोली

दिवाली नज़दीक थी, और हर साल की तरह श्रद्धा को ससुराल में ही त्योहार मनाना था, जबकि उसका मायका दो गली छोड़कर ही था। शादी के बाद से उसने कभी भी दिवाली के दिनों में माँ के आँगन में रंगोली नहीं बनाई, क्योंकि सास को उसका मायके जाना पसंद नहीं था। हर दिन वह ससुराल के आँगन में रंगोली बनाती, पर मन माँ के खाली आँगन में बसता, जहाँ अब रौनक खत्म हो चुकी थी। एक-दो बार मायके जाकर उसने देखा कि माँ आसपास के बच्चों से छोटी-सी रंगोली बनवाती हैं, पर न माँ ने उससे आने को कहा, न वह कह पाई। बात छोटी थी, पर कहने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाई। उसे हमेशा यह दर्द रहा कि वह बेटी होकर भी अपने घर जाने के लिए ससुरालवालों की अनुमति पर निर्भर है—शायद इसी वजह से लोग बेटा मांगते हैं, क्योंकि बेटियाँ शादी के बाद अपने ही घर के लिए पराई हो जाती हैं।

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