बड़े दिलवाला
कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।

कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।
बुढ़ापा जब शरीर को नहीं, आत्मसम्मान को थका देता है.तब बहू के हाथ का हलवा भी माँ की आँखों में
बीते दिनों की कसक भर देता है।
कभी-कभी एक साधारण-सी बातचीत हमें किसी भूली-बिसरी सच्चाई से रूबरू करवा देती है। यह कहानी भी ऐसी ही एक स्त्री की है — एक पढ़ी-लिखी बंजारन, जो विवाह के बाद घर-परिवार और खेतों की ज़िम्मेदारियों में इस कदर उलझी कि अपने अस्तित्व का ख्याल रखना ही भूल गई। उसकी सारी सोच अपने बच्चों के भविष्य और परिवार की सेवा में समर्पित रही। हमेशा डरती रही — “मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा?” और फिर वही डर सच हो गया।
उसके जाने के बाद, जिस परिवार के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगाया था, उन्होंने जल्दी ही उसका स्थान भर दिया — दूसरी शादी, आया की व्यवस्था, और जीवन फिर से पटरी पर। और आया भी, जो सबका ख्याल रखते-रखते खुद बीमार होकर चल बसी… उसके बाद भी जीवन नहीं रुका।