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साहित्यिक चमत्कार

हित्य में अब चमत्कारों की कोई कमी नहीं रही। कुछ लेखक तो इतने पारंगत हो गए हैं कि बीस कहानियों को छह अलग-अलग पुस्तकों में बाँटकर छाप देते हैं—हर पुस्तक में पाँच कहानियाँ कॉमन! और जब यह भी कम पड़ता है तो बालकथा और कविता की पतली-पतली किताबें छपवाकर अपने खाते में पुस्तकों की संख्या बढ़ा लेते हैं।पाठक भी भाग्यशाली होते हैं—उन्हें एक ही कहानी पाँच–छह बार, अलग-अलग शीर्षकों से पढ़ने का अवसर मिलता है।

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सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला..

तो ख़बर ये है, मित्र… कि सिस्टम हमेशा की तरह सिस्टमैटिकली अपने बाल भी बाँका किए बिना फिर से बच निकला है, जैसे उसे संविधान की किसी फुटनोट में कोई स्पेशल छूट मिली हो.
एक बार फिर, एक स्कूल की छत ढह गई और हमेशा की तरह, मासूम बच्चे ढहती दीवारों के नीचे दब गए. कुछ घायल हुए, कुछ अनंत यात्रा पर निकल लिए…
आप कहेंगे, ऐसी तो और भी इमारतें ध्वस्त हुई हैं भूस्खलन हुआ, बाढ़ आई, करंट लगने से भी अच्छे-खासे जान और माल की हानि हुई फिर आप इस एक सरकारी इमारत के पीछे क्यों पड़े हैं?
बस इसीलिए कि ये सरकारी थी.
सरकार इधर खुद की जोड़-तोड़ में लगी है. एक बार फिर आपने उसे व्यस्त कर दिया ङ्गहमें दुःख हैफ की बजरी, ङ्गदोषियों को बख्शा नहीं जाएगाफ के सीमेंट और सरकारी ब्रांड के मगरमच्छी आँसुओं का पानी मिलाकर एक गाढ़ा लेपन तैयार हुआ है जिससे की जाएगी लीपापोती.

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घर में उदास बैठा पिता और मोबाइल में व्यस्त बच्चे, बदलते पारिवारिक रिश्तों का दृश्य

बाप रे बाप

यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।

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