वो साल अच्छा था
“न ये हाल अच्छा है न वो हाल अच्छा था, इस साल से कह दो कि वो साल अच्छा था! इफरात में मिली मोहब्बत को जेब में रखने की जगह न थी, फटी जेब और तंग हाल ही अच्छा था।”

“न ये हाल अच्छा है न वो हाल अच्छा था, इस साल से कह दो कि वो साल अच्छा था! इफरात में मिली मोहब्बत को जेब में रखने की जगह न थी, फटी जेब और तंग हाल ही अच्छा था।”
उस सुबह आंगनवाड़ी परिसर में बच्चों की हंसी गूंज रही थी। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में यह जगह चीखों, अफरा-तफरी और मौत से टकराने वाली बहादुरी की गवाह बनने वाली है।
अचानक मधुमक्खियों का एक झुंड आंगनवाड़ी में खेल रहे बच्चों पर टूट पड़ा। नन्हे हाथ सिर ढकने लगे, मासूम आंखों में डर तैर गया
एक पिता जिसने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, वही बुढ़ापे में भावनात्मक उपेक्षा का शिकार हो जाता है। “रोटी की दास्तान” रिश्तों की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
यह पाठ जीवन की कठिनाइयों और नैतिक संघर्षों का दर्पण है। यह बताता है कि सही और अच्छा बने रहना जितना सुनने में आसान लगता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन है। चाहे परिवार और अपनों के साथ संबंध हों या समाज की अपेक्षाएँ, हमेशा सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। लेखक अपने भीतर और बाहरी दुनिया में छिपे संघर्षों को उजागर करता है—अपने अंदर के रावण को पहचानना और उसे नियंत्रित करना, सही और गलत के बीच अंतर समझना, और स्वार्थी दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों की तलाश करना। यह न केवल व्यक्तिगत जुझारूपन का वर्णन है, बल्कि समाज और मनुष्य के अंतर्मन की जटिलताओं की भी गहरी झलक देता है।
“मॉं” में माँ को जीवन का आधार, हृदय की आवाज़ और आत्मा का सहारा बताया गया है। माँ केवल काया नहीं, बल्कि माया, अनुशासन, संस्कार और ईश्वर की आराधना का प्रतीक हैं। बच्चे की किलकारी, परिवार का बंधन और घर की यादें माँ की खुशी और शक्ति का हिस्सा हैं। कविता यह दर्शाती है कि माँ का अस्तित्व, उनका स्नेह और उनका मार्गदर्शन जीवन की हर परिस्थिति में अनमोल हैं और उनके नाम का पन्ना कभी फटता नहीं।
फूल प्रकृति का सबसे सुंदर उपहार हैं, जो सौंदर्य, सुगंध और भावनाओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं। उनकी खुशबू न केवल रिश्तों में मिठास घोलती है, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करती है।
कभी-कभी सच्चा प्रेम किसी को पा लेने में नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को फिर से जीवित कर देने में छिपा होता है। राघव और रिद्धिमा की यह कहानी प्रेम, स्वतंत्रता और आत्मीयता के उसी गहरे एहसास को महसूस कराती है।
मोहब्बत अजीब है…जिन्हें हमारी कद्र नहीं, हम वहीं अपनी रूह रख आते हैं।हम उनके लिए हर लम्हा ख़यालों में सुलगते रहते हैं,और वो हमारी बे-ख़ुदी की ख़बर तक नहीं लेते। शिकायत भी नहीं कर सकते…क्योंकि इश्क़ में इख़्तियार हमारा होता ही कहाँ है।
मैं कविता हूँ” केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वीकार है। दुख, सुख, प्रकृति और समय के बीच कविता स्वयं को खोजती और सदा जीवित रहती है।
महिला जागृति अभियान की पाँचवीं वर्षगांठ के अवसर पर इंदौर में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार अरुणा खरगोनकर द्वारा संपादित विधवाओं की दशा पर केंद्रित स्मारिका का लोकार्पण किया गया. आयोजन विचार प्रवाह साहित्य मंच के तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब स्थित एक रेस्तरां के सभागार में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ उपस्थित थीं.कार्यक्रम का शुभारंभ महाराष्ट्र में विधवा प्रथा उन्मूलन आंदोलन के जनक प्रमोद झिंझड़े, वरिष्ठ पत्रकार व समाजकर्मी प्रसून लतांत, इंदौर प्रेस क्लब के मुकेश तिवारी, विचार प्रवाह साहित्य मंच की अध्यक्ष सुषमा दुबे और समाज चिंतक मनीष खरगोनकर ने संयुक्त रूप से किया.