मन की आवाज़ और मुसाफ़िर दिल…

दूरी, अनिश्चितता और आत्मसंघर्ष से भरे इन भावों में एक अकेली रूह की पुकार है – जो कभी अपने प्रिय को पुकारती है, कभी जीवन की राहों से सवाल करती है, तो कभी अंधेरों में खुद को एक जुगनू की तरह जलता हुआ महसूस करती है। ये पंक्तियाँ उस मन की आवाज़ हैं जो भटकते हुए भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

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खुद से प्यार: एक छोटी शुरुआत, एक बड़ी मुस्कान

हम अक्सर दूसरों को खुश करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद से प्यार करना भूल जाते हैं। लेकिन असली सुकून तब मिलता है जब हम खुद को अपना फेवरेट बना लेते हैं। खुद से बात करना, अपने साथ समय बिताना, और खुद को समझना – यही तो है सच्चा प्यार। क्योंकि जब आप खुद से प्यार करेंगे, तभी दुनिया भी आपको उसी नजर से देखेगी।

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ख्वाहिशें

ख्वाहिशें भी किसी जिद्दी औरत की तरह होती हैं—कभी छुपे धन की लालसा, कभी पेड़ों से बरसते पैसों का सपना। ये मन में जन्म लेती हैं, घर बसाती हैं और जरूरतों का एक अंतहीन परिवार खड़ा कर देती हैं। पूरी न हों तो अंधेरी गलियों में भटकती हैं। फिर भी, इंसान और इच्छा का रिश्ता सदियों पुराना, गहरा और अटूट है।

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“रिश्तों की श्वास: विश्वास”

जिस प्रकार जीवन के लिए श्वास लेना आवश्यक है, उसी प्रकार रिश्तों को जीवित रखने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि रिश्तों में शक, झूठ और अवसाद जैसी अशुद्ध वायु भर जाए, तो उनका दम घुटने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्वयं सकारात्मक रहें और अपने रिश्तों को विश्वास की स्वच्छ हवा प्रदान करें, क्योंकि इन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है – किसी और की नहीं।

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शशिकला पटेल को पीएच.डी. की उपाधि

मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा शशिकला पटेल को समावेशी शिक्षा पर किए गए उत्कृष्ट शोध के लिए डॉक्टरेट (पीएच.डी.) की उपाधि प्रदान की गई है। उन्होंने यह शोध गोखले कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड रिसर्च, परेल में प्रो. (डॉ.) प्रशांत काले के मार्गदर्शन में पूर्ण किया। इस अवसर पर कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति रही, जिन्होंने उनके शोधकार्य में सहयोग और प्रेरणा प्रदान की।

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प्रेम

प्रेम हो जाना किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है। ये मर्जी से नहीं आता, पर बहुत कुछ उजाड़ सकता है। जैसे नदियां लौट आती हैं अपने पुराने रास्तों पर, प्रेम भी तमाम वर्जनाओं को पार कर अपना रास्ता बना लेता है। प्रेम कोई पूर्णता नहीं, कोई गणना नहीं – ये मिट्टी की गंध, सूरज की तपिश और चाँदनी की ठंडक सा है। मैं नहीं जानती प्रेम क्या है, बस इतना जानती हूं कि इसकी खोज अनंत है – इस दुनिया के बाद की किसी नई दुनिया तक।

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आराधना – जो हर बार टूटी, फिर भी हर बार लौटी

शराब सिर्फ नशा नहीं, एक ज़हर है – जो रिश्तों को अंदर से खोखला कर देता है। आराधना की कहानी किसी फिल्म से नहीं, हमारे ही समाज से निकली सच्चाई है – जहां एक पत्नी अपने शराबी पति की मार, अपमान और बेवफाई को सालों झेलती रही, सिर्फ इसलिए कि शायद अगली बार सब ठीक हो जाएगा। लेकिन कभी नहीं हुआ। फिर भी वह लौटी… क्योंकि औरतें सिर्फ माफ नहीं करतीं, वो हर बार खुद को जोड़ती हैं – खामोशी से, टूटते हुए।

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ज़िंदगी कुछ इस तरह…

वो शाम, वो शहर, वो गुलाब, वो चाय — सब कुछ जो मेरा था, किसी और का हो गया। मेरी हर पसंद, हर भावना, हर छुअन की कल्पना… कोई चुपचाप अपने साथ ले गया। यह कविता नहीं, मेरी बिखरी हुई ज़िंदगी की दास्तान है।

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जब स्त्री प्रेम करती है….

वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।

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‘नामाचा गजर’ ‘नामाचा गजर’

कलाश्री संगीत मंडल द्वारा आयोजित ‘नामाचा गजर’ कार्यक्रम 6 जुलाई को एरंडवणे स्थित शकुंतला शेट्टी सभागृह में आयोजित किया जाएगा। पं. रघुनाथ खंडाळकर अपने पुत्रों के साथ प्रस्तुति देंगे, साथ ही पं. भीमसेन जोशी के पुत्र श्रीनिवास जोशी और पोते विराज जोशी भी मंच पर नजर आएंगे।

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