दुविधा का रंग
यह जीवन की वह अवस्था है जहाँ न बचपन की मासूमता पूरी तरह बची है, न बुढ़ापे का सुकून मिला है। जिम्मेदारियों के बीच खड़ा इंसान कभी समाज की अपेक्षाओं को सुनता है, तो कभी अपने दिल की धीमी पुकार को। इसी द्वंद्व में वह खुद को पहचानता है और समझता है कि यही सफ़र जीवन का असली रंग है।
ऑनलाइन की हरी बत्ती..
हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।
पेट्रोल या हाइब्रिड: कौन है ज्यादा फायदे का सौदा?
पेट्रोल कारों और स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड वाहनों के बीच माइलेज का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही हाइब्रिड तकनीक की कीमत भी लाखों रुपये ज्यादा है. ऐसे में कार खरीदने की योजना बना रहे ग्राहकों के सामने यह बड़ा सवाल है कि बेहतर माइलेज के लिए ज्यादा पैसे खर्च करना सही फैसला है या नहीं.
फर्ग्युसन रोड : पुणे की धड़कन पर एक दिन
णे शहर की रगों में सिर्फ इतिहास नहीं, आज की धड़कन भी बहती है और उस धड़कन की सबसे तेज़ लय सुनाई देती है फर्ग्युसन रोड पर। यहां की सड़कों पर चलती जवान होती नई पीढ़ी, अपने सपनों के स्केच बनाते कलाकार, नए फैशन की तलाश में भटकती युवतियां, और हर नुक्कड़ पर सजे खाने-पीने के ठिकाने .सब मिलकर एक ऐसा जीवंत कोलाज रचते हैं, जिसे देखना नहीं, जीना पड़ता है। चाहे वह ‘कट्टा’ पर बैठे युवाओं की हलचल हो, या ब्रश और कैनवास के बीच गहराते रंग, हर पल कुछ नया, कुछ असाधारण घट रहा होता है। यही पुणे है. जहां हर मोड़ पर ज़िंदगी मुस्कुरा रही होती है, और हर सड़क पर एक नई कहानी जन्म लेती है।कभी-कभी शहर के किसी एक रास्ते पर चलने भर से आप उस शहर की आत्मा से मिल लेते हैं। पुणे में फर्ग्युसन रोड (एफसी रोड) एक ऐसा ही रास्ता है .जो केवल एक सड़क नहीं, एक एहसास है।
सिंहस्थ में श्रद्धालुओं को राह दिखाएंगे स्मार्ट साइनेज
आगामी सिंहस्थ मेले के लिए उज्जैन में स्मार्ट साइनेज सिस्टम लागू किया जाएगा। शहर और मेला क्षेत्र में एक जैसे दिशा-सूचक बोर्ड लगाकर श्रद्धालुओं को आसान नेविगेशन और बेहतर भीड़ प्रबंधन की सुविधा दी जाएगी।
दो सितारों का मिलन…42 साल बाद
बयालीस साल बाद हुई यह मुलाकात सिर्फ दो पुराने साथियों के मिलने भर की नहीं थी, बल्कि उन दिनों की धड़कनों को फिर से जी लेने जैसा अनुभव थी। इंदौर की गलियों में साइकिल से खबरों की तलाश में दौड़ते हुए बिताए गए वे दिन यादों की परतों से झाँकने लगे — अनंत चतुर्दशी की रातें, दंगों के बीच रिपोर्टिंग की बेचैनी, और श्मशानघाटों से जुटाई गई खबरों की जिम्मेदारी।
रतलाम के घर में बैठे हुए, चाय की प्यालियों के बीच समय जैसे ठहर गया था। हम दोनों बीच-बीच में ठहाके लगाते, कभी पुराने नामों को याद करते और कभी आज की पत्रकारिता पर अफसोस जताते। प्रदीप जब अपनी खबरों के डिजिटलाईजेशन की बात कर रहे थे, तो मन में एक अजीब कसक उठी — कुछ चीज़ें वक्त के साथ सँभाल लेनी चाहिए थीं।
केसी कॉलेज का इंटर कॉलेजिएट फेस्ट “किरण” 13 से
-किशनचंद चेल्लाराम (केसी) कॉलेज का प्रतिष्ठित इंटर कॉलेजिएट फेस्ट किरण सिर्फ एक फेस्ट नहीं रह गया है, बल्कि अपने समय की एक ऐसी उत्कृष्ट सांस्कृतिक प्रस्तुति बन चुका है, जिसे हर वर्ष विद्यार्थी, शिक्षक और प्रतिभागी लंबे समय तक याद रखते हैं. एन.एच.एस.आर.ई. की डायरेक्टर और एचएसएनसी यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर कर्नल प्रो. डॉ. हेमलता बागला ने कहा कि हर तरफ त्यौहारों का माहौल है,
ज़िंदगी आखिर कट ही जाएगी
ज़िंदगी अंत में कट ही जाती है चाहे हम मोहब्बत में डूबे हों या किसी की नफ़रत से लड़ रहे हों। कभी दर्द के साये में गुज़रती है, तो कभी हँसी की छोटी-सी किरण उसे रोशन कर देती है।
जीवन की यही सच्चाई है: दो पल का सफ़र, जो हाथ से फिसलते हुए भी हमें कुछ सिखा जाता है। खुशियाँ छोटी हों या बड़ी, बाँट देने से ही दिल हल्का होता है। ग़मों को अंदर दबाकर रखने से वे बोझ बन जाते हैं लेकिन किसी अपने के साथ उन्हें साझा कर लिया जाए तो वही दर्द ताकत में बदल जाता है।
बेचारी बिल्ली
आंगन में लगे अमरूद के पेड़ को देखकर बहूरानी का मन हर रोज़ ललचा जाता था, लेकिन आंगन की खाट पर बैठी माँजी की वजह से चुपके से तोड़ पाना मुश्किल था। एक दिन माँजी गहरी नींद में थीं, तो बहू ने जल्दी से कुछ अमरूद तोड़कर खिड़की वाली मेज़ पर छुपा दिए। लेकिन इस पूरी चोरी को एक सयानी बिल्ली देख रही थी। बाद में वही बिल्ली मेज़ पर चढ़कर सारे अमरूद उठा ले गई। जैसे ही सास-बहू ने देखा, बहू तो घबरा गई, और सास ने गुस्से में “चालाक बिल्ली” को चप्पल-डंडे से खूब भगाया।
