सरस्वती वन्दना

यह कविता एक साधिका की अंतरतम पुकार है, जिसमें वह माँ से प्रार्थना करती है कि उसका अंतर्मन शुद्ध, निर्मल और विकारों से रहित हो जाए। वह चाहती है कि उसका प्रत्येक श्वास एक श्रद्धा से भरा पूजन बन जाए, और उसका मन ऐसा हो जैसे मुस्काता हुआ वृंदावन। कविता में भक्ति का भाव सहज रूप से बहता है — कभी वह मन की वीणा पर माँ की महिमा का गीत गाना चाहती है, तो कभी बनमाली को खोजती हुई नंदनवन की ओर बढ़ती है।
कवयित्री अपने जीवन में अवरोधों को दूर कर विश्वास की गली में ‘निवी’ नामक दीप जलाकर गतिमान बनने की आकांक्षा रखती है। यह रचना केवल भक्ति नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और चेतना के उजास की ओर यात्रा है।

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आदर, मंच और धोखा

“एक दिन अचानक सरला के खाते में साढ़े तीन लाख रुपये आ जाते हैं। कोई जानकारी नहीं, कोई सूचना नहीं। थोड़ी ही देर में एक फोन आता है—‘मैं रामभरोस बोल रहा हूं, मेरी बहू से गलती से आपके खाते में पैसे आ गए हैं, लौटा दीजिए।’ सरला चौंक जाती है। क्या यह कोई साजिश है या ईमानदारी? चेक लौटाया जाता है। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकती। वह आदमी बार-बार घर आने लगता है—कभी चाय पर, कभी मोहल्ले में गाड़ी खड़ी करने के बहाने। उसके शब्दों में ‘मिशन’, ‘समाजसेवा’ और ‘फायदा’ की मीठी-मीठी बातें होती हैं।

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भारत में नीली आंखें: एक रहस्यमयी विरासत

भारत की गलियों में जब कोई बच्चा नीली आंखों के साथ मुस्कराता है या जब पर्दे पर ऋतिक रोशन, करिश्मा कोटक या निकोल फारिया जैसे सितारों की नीली आंखें चमकती हैं, तो एक सवाल हर किसी के मन में जरूर उठता है – “भारत जैसे सांवले-त्वचा प्रधान देश में ये नीली आंखें आखिर आई कहां से?”

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गधे पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं…

अगर आप सोचते हैं कि बिना मेहनत के मोटी कमाई संभव नहीं तो जनाब आप गलत हैं। पेश है “बाबा मेकिंग कंपनी प्रा. लि.” का बेमिसाल मॉडल, जहाँ थोड़ी वाकपटुता, थोड़ी झूठ बोलने की कला और चमत्कार बेचने का हुनर आपको रातों-रात ‘दी ग्रेट बाबा’ बना सकता है। लाखों गधे आपका इंतजार कर रहे हैं जो आंख मूंदकर आपके ‘चमत्कार’ पर भरोसा करेंगे। बस दस हज़ार रुपये निवेश कीजिए और करोड़ों में खेलिए। धर्म, चमत्कार और गधों की दुनिया में आपका स्वागत है!

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शिव

यह कविता शिव महिमा का अनुपम वर्णन है, जिसमें सदाशिव की अनंत महिमा, करुणा, दया और प्रेम का भावपूर्ण चित्रण किया गया है। शिव केवल तीनों लोकों के स्वामी ही नहीं बल्कि भक्तों के उद्धारक भी हैं। डमरू की ध्वनि से गुंजित, दूध और जल की धार से पूजित, सदाशिव का प्रत्येक रूप श्रद्धा से भरा हुआ है। शिव शंभू न केवल काशी के वासी हैं बल्कि हर कण में विद्यमान हैं। उनका भस्म रमाया रूप, सर्पों का हार, नंदी पर विराजमान स्वरूप—सभी जीवन के हर क्षण में शांति और शक्ति का संचार करते हैं।

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सुनो पलाश …

हर साल फरवरी में पलाश जब अनंत से उतरकर मेरे छत की मुंडेर तक खिल जाता था, तब कुछ भीतर गुनगुनाने लगता था। ज्वालामुखी से दहकते फूलों की गरमी मेरी उँगलियों तक दौड़ जाती थी। किताबें बेअसर हो जाती थीं, मन मुंडेर पर टिक जाता था, और अम्मा की डांट भी उस खींचाव को रोक नहीं पाती थी। तब नीले स्कर्ट की सुनहरी किनारी घुटनों तक फहराती थी और गालों पर सिंदूरी रंग अपनी पहली होली खेलने लगता था। साल दर साल फरवरी आती रही, लेकिन आज कपोल रक्तहीन हो गए, स्कर्ट बीते दिनों की बात बन गई, और अम्मा की डांट एक स्मृति। लेकिन मन अब भी चाहता है कि पलाश लौटे, फिर एक बार मुंडेर तक झुके, फिर से होरी से पहले होली खेली जाए।

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एक प्याली चाय… और पीछे छुपा पूरा असम

“भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू। हर सुबह की शुरुआत, हर शाम की थकान, दोस्तों की हंसी और दफ्तर की भागदौड़—इन सबके बीच कहीं न कहीं असम की मिट्टी और मेहनत की खुशबू घुली होती है। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी और मेहनती मजदूरों की तपस्या से निकली हर चाय की चुस्की सिर्फ स्वाद नहीं, एक संस्कृति, संघर्ष और सम्मान की दास्तान सुनाती है।”

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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क्यूँ जिंदा है…

“क्यूँ ज़िंदा है ज़िंदगी जब ये सवाल करे,
उत्तर अपने सारे बस बवाल करे,
मीठे बोले लगते हो खारे,
ख्वाब सारे रह जाए अधूरे,
जो आंखों में आंसू भर भर आये —
उफ्फ! अब ना तो जिया जाए,
तब मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।”

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