कालू का दर्द  

हमेशा खुश रहने वाले कालू कुत्ते को उदासी लिए असमय घर आया देख उसकी मां मिल्की ने पूछा – ‘ क्या बात है कालू ! रोज तो बुला बुला कर थक जाती हूँ फिर भी नहीं आता है आज अचानक — और इतना उदास भी क्या किसी ने मारा तुझे?’ कालू ने बड़े ही दर्द…

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सबसे बड़ा है कौन

सत्ता ,संगठन और राजनेता राजनीति की मुख्य धुरी हैं। कहा जाता है कि अगर इनमें तालमेल है तो सब कुछ ठीक नजर आता है मगर कभी कभी इनमें वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाती है और फिर यह तयः करना मुश्किल होता है कि इन तीनों में से कौन बड़ा है ,सर्वश्रेष्ठ है या किसकी चलती है या किसकी सुनी जा रही है। देखा जाए तो संगठन ही सबसे बड़ा होता है क्योंकि संगठन ही सबको जोड़कर रखता है और संगठन के नीचे ही सब काम करते हैं और संगठन ही निर्णय करता है कि कौन चुनाव लड़ेगा और जीतकर सत्ता में जायेगा और कौन संगठन में काम करेगा। संगठन ही तयः करता है कि कौन राजा बनेगा और कौन मंत्री । इसलिए संगठन और संगठन का मुखिया ही बड़ा होता है। संगठन से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले चारों खाने चित ही दिखाई दिए हैं।

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saint

संतोष बड़ा धन

तिरुवल्लुवर तमिलनाडु के एक महान संत, कवि और दार्शनिक थे. दूर-दूर से लोग उनसे मार्गदर्शन लेने आते. एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, गुरुजी, इतने विद्वान होने के बावजूद आप दयनीय हालत में गुजारा करते हैं. आपकी बातों से हमें क्या मिलेगा?तिरुवल्लुवर मुस्कुराए और उस व्यक्ति से पूछा क्या तुम मेरे साथ एक यात्रा…

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शिव से हो जाओ तुम..

जो खोना नही चाहते रिश्तों को जहर के घूंट पी के भी, मुस्कुराओ तुम, शिव से हो जाओ तुम.. दो बोल भी मीठे ना मिले किसी रिश्ते में, कोई गम नही, तपती झुलसती बातें भुला के प्यार की बरसात कर जाओ तुम शिव से हो जाओ तुम…. बड़े भी चाहे तुम्हें, बच्चे भी बतियाये, तुमसे…

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भरपेट खाना

हेमा के तीन बच्चे थें।सबसे बडी़ लड़की माया फिर दो लड़के किट्टू और बिट्टू ।हेमा लोगों के घरों में बर्तन मांजने और झाडू पोछे का काम करती थीं ।कहने को पति था , लेकिन न होने के बराबर ।वह एक दूकान पर कपड़े सिलाई का काम करता था। हुनर था हाथों में ।सिलाई अच्छी कर…

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“कभी खुद के लिए भी जी ले माँ…”

जाने हमेशा ऐसा क्यों लगता है सारे असंभव काम आप ही कर सकती हो… जादुई सी बेतरतीब से बंधे माँ के जूडे से हमेशा बाल की एक पतली सी लट छूट जाया करती थी, जो पसीने से गर्दन में चिपकी रहती। इतनी गर्मी में रोटियां बनाते हुए माँ पसीने से नहा उठती। सब काम निपटा…

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प्रेम होने तो दो

प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।

कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।

जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।

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प्रेम पाक

हंडिया सी इस घाटी में एक दिन अवकाश का दो स्कूप बादल, रात भर भीगी गुनगुनी हवा, पेड़ों से छन कर आती  धूप के कुछ कतरे और  अंजुली भर पानी बारिश का उस पे बुरकना है  तुम्हारे सान्निध्य का  एक छोटा चम्मच मसाला … बस इतनी सी तो है इच्छा चलो दोनों मिल आज ढलते…

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बिदाई

बिदाई -गीता गैरोला मैं पतझड़ में खड़ा पेड़ हूं जिसे अपनी पत्तियों को विदाई देनी है जन्म के लिए मृत्यु उतनी ही जरूरी है जितनी मृत्यु के लिए जन्म जरूरी है मैं अपनी मिट्टी में उत्तप्त ऐसे खड़ी हूं जैसे मरने से पहले कोई प्रेम करने को आतुर खड़ा हो  या मरने के तुरंत बाद…

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खूंटी पर टंगी संवेदना..

लोग घर की खूँटी पर टांग कर निकलते हैं संवेदना… और फिर उन्हें नहीं फर्क पड़ता सड़क किनारे हो रहे हादसों से उन्हें नहीं फर्क पड़ता की एक युवक बार बार घोप रहा है हाथ में लिये अपने औजार को किसी युवती पर जो तड़प रही है दर्द से… लोग एक दूसरे को देखते हैं…

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