
मौसमी चंद्रा, पटना
इस बार दिवाली कुछ जल्दी आ गई थी या शायद अथर्व को ऐसा लग रहा था। कितनी तेजी से बीता यह साल! सब कुछ जैसे फटाफट हुआ। भैया का प्लस टू का एग्जाम, फिर अच्छे रिजल्ट के बाद घर में पूजा… क्योंकि मम्मी की सेलिब्रेशन लिस्ट में सबसे ऊपर पूजा और मंदिर दर्शन ही होता है। कहती हैं, ईश्वर को थैंक यू बोलना जरूरी है। पूजा के बाद भैया का दूसरे शहर में एडमिशन, मम्मी की लंबी-चौड़ी शॉपिंग और उसे हॉस्टल छोड़ने जाना… सब फटाफट!
इस आपाधापी में पूरा साल सुपरजेट की स्पीड से भागा! और दिवाली कितनी जल्दी आ गई! अभी तो पिछली दिवाली की यादें भी धुँधली नहीं हुई थीं। भैया और अथर्व ने कितनी मस्ती की थी… साथ मिलकर छत की सजावट, सफाई, झालरें लगाना, पटाखे छोड़ना और मम्मी से छिपकर मिठाई उड़ाना… इस बार कहाँ गया वह उत्साह!
पापा ने कोशिश की थी कि घर में वही पुरानी रौनक बनी रहे। बाजार से फूल, कंदील, पटाखे और ढेर सारी झालरें ले आए थे। माँ ने मिठाइयों के डिब्बे सजा दिए थे और आँगन में रंगोली बनाने के लिए रंग भी आ चुके थे। मगर अथर्व को इन तैयारियों में कुछ कमी-सी लग रही थी।
कमी थी उसके बड़े भाई अनिरुद्ध की।
पिछले साल दिवाली पर दोनों ने मिलकर पूरे घर में लाइटें लगाई थीं। इस बार अथर्व ने अकेले ही सीढ़ी लगाकर झालर टाँगने की कोशिश की, लेकिन एक कोना बार-बार नीचे झूल जाता था।
“भैया होता तो पाँच मिनट में ठीक कर देता!” उसने झुँझलाकर कहा।
मम्मी रसोई से हँसकर बोलीं, “फोन कर ले, बता देगा कैसे लगानी है।”
“फोन पर थोड़ी न सीढ़ी पकड़ सकता है!”
कहकर वह खुद भी हँस पड़ा!
उस शाम वह अपने कमरे में बैठा पुरानी तस्वीरें देख रहा था। दोनों रंगों से पुते हुए… पटाखे छोड़ते, दीये जलाते… कितनी सुंदर थीं सारी तस्वीरें!
अथर्व को याद आया, एक बार दिवाली के दो रोज पहले ही धूप में सुखाए जा रहे पटाखों में से चॉकलेट बम निकालकर कैसे चुपके से जलाने की कोशिश की थी और बदले में पूरा हाथ जला बैठा था! मम्मी ने पिटाई करने के लिए दौड़ाया तो भैया कितना गुस्सा हुआ था…
“अभी नहीं पीटने दूँगा मम्मी! यह ऐसे ही इतना रो रहा है।”
फिर उसे प्यार से चुप कराया और दवा लगाई।
याद करके अथर्व को रोना आने लगा… कितना अच्छा है भैया। चिढ़ाता है, पर प्यार भी तो करता है।
अगले दिन भी छोटी-छोटी बातों में उसे भाई की याद आती रही। सुबह नहाने के बाद उसने अनिरुद्ध की पुरानी टी-शर्ट पहन ली। माँ ने देखा तो कहा, “इतनी ढीली टी-शर्ट क्यों पहनी? अपनी टी-शर्ट नहीं है क्या?”
“ये कंफर्टेबल है।”
दोपहर में मिठाई खाते हुए उसे याद आया कि भैया हमेशा उसके हिस्से की काजू कतली भी खा जाता था। उसने प्लेट से एक टुकड़ा उठाया और वापस डिब्बे में डाल दिया।
“किसके लिए बचा रहा है?” माँ ने पूछा।
“किसी के लिए नहीं।”
शाम को धनतेरस की पूजा की तैयारी शुरू हुई। मम्मी थाली में दीये लेकर दरवाजों पर रखने लगीं। अथर्व ने एक दिया उठाया और भैया के कमरे की खिड़की पर भी रख आया।
कमरे में सब कुछ वैसा ही था… टेबल पर पुरानी किताबें, टेबल लैंप, दीवार पर मेस्सी की बड़ी-सी तस्वीर, कोने में भैया के डंबल और दरवाजे पर पुल-अप बार।
वह कुछ देर वहीं बैठा रहा। हर दिवाली पर दोनों इसी कमरे में बैठकर लिस्ट बनाते थे कि कौन-से और कितने पटाखे लेने हैं!
उसने मोबाइल निकाला और टाइप किया…
“भैया, इस बार दिवाली बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही।”
कुछ देर बाद जवाब आया-
“क्यों?”
जवाब में उसने सैड इमोजी भेज दी।
“ओ पग्गल, मजे कर, खूब मिठाई खा और मन भर पटाखे छोड़ना! मैं नहीं हूँ छीनने के लिए!”
अथर्व ने फोन रख दिया। उसे रोना आने लगा…
दिवाली का दिन आ गया!
सुबह के करीब सात बज रहे थे। तभी घंटी बजी!
“अथर्व, जरा देख कौन है!” माँ ने आवाज लगाई।
वह अनमने ढंग से दरवाजे तक गया। सामने उसका भैया खड़ा था।
कंधे पर बैग, हाथ में चॉकलेट और चेहरे पर शरारती मुस्कान।
“क्या हुआ? पहचान नहीं रहा?”
अथर्व कुछ क्षण उसे देखता रहा।
“भैया!”
अगले ही पल वह उससे लिपट गया।
“तुमने बताया क्यों नहीं? कब आए? कैसे आए? तुमने तो कहा था नहीं आओगे!”
अनिरुद्ध हँसते हुए बोला, “इतने सारे सवाल! पहले बैग तो पकड़।”
अथर्व ने बैग भी नहीं पकड़ा। वह बस उसका हाथ थामे भीतर ले आया। माँ ने बेटे को गले लगा लिया।
“कुछ खाने को दो मम्मी। कल से ढंग का कुछ नहीं मिला खाने को।”
अथर्व बीच में बोल पड़ा, “काजू कतली लाऊँ! बचाकर रखी है मैंने अपने हिस्से की!”
अनिरुद्ध ने उसकी ओर देखा।
“ओहो! इतना प्यार!”
अनिरुद्ध ने उसे दुलार से देखा।
दोनों हँसने लगे।
कुछ देर बाद दोनों छत पर थे। वही पुरानी झालर अब भी एक कोने से झूल रही थी।
अनिरुद्ध ने उसे देखा और पूछा, “ये किसने लगाई है?”
अथर्व ने मुँह बनाया, “कोशिश की थी, पर मुझसे अकेले नहीं हुआ!”
“अच्छा, हट। पकड़ सीढ़ी।”
दोनों काम में लग गए। नीचे माँ उन्हें आवाज देती रहीं और ऊपर से दोनों की हँसी की आवाजें आती रहीं।
फिर पूरा दिन पूजा की तैयारी, घर सजाने और पटाखे छोड़ने में बीत गया। मम्मी ने सबके लिए चमकीले रंग के कुर्ते लाए थे! घर में वही पुरानी रौनक लौट आई थी।
देर रात दोनों भाइयों की गपशप चलती रही…
सुबह जब मम्मी कमरे में गईं तो देखा, दोनों भाई एक-दूसरे में गुँथे हुए सोए पड़े थे! अनिरुद्ध का एक पैर अथर्व की तरफ था और अथर्व ने उसकी बाँह को तकिए की तरह इस्तेमाल कर रखा था।
माँ कुछ देर मुस्कुराकर उन्हें देखती रहीं…
फूल मुरझा गए थे, आँगन में रखे दीये भी रात भर जगकर सो गए थे, रंगोली हल्की-सी छितर गई थी, लेकिन छत पर मजबूती से टँगी झालर बता रही थी कि किसी भी त्योहार की चमक रिश्तों की खूबसूरती और अपनों की मौजूदगी से होती है, इन बनावटी चीजों से नहीं!
सच है न!
