
विजय सिंह चौहान
“पिताजी, एक बात कहनी है।”
शराबी बेटे की बात सुनकर पिता ने झिड़कते हुए कहा, “पेंशन, पैसा, मान-सम्मान। सब शराब में घोलकर पी गया, अब क्या बचा है?”
“आपकी और छुटकी की बात दिल पर लग गई? तो मैं क्या करूँ…” बाबूजी की चिंता हवा में तैर गई।
नज़रें झुकाए पवन बोला, “बाबूजी, श्राद्ध पक्ष और उसके बाद नवरात्र बीत गए, लेकिन मैंने शराब की ओर देखा तक नहीं। आप चाहें तो अपनी बहू से पूछ लीजिए।”
पवन ने झुककर पिता के चरण छुए।
बाबूजी का चेहरा खिल उठा। “अरे वाह! इससे शुभ क्या होगा! सही मायने में आज है हमारा हैप्पी दशहरा।”
पवन के चेहरे पर रौनक लौट आई। उधर, परदे के उस पार शकुंतला गुनगुनाते हुए अपनी माँग भर रही थी।
