
संध्या यादव, मुंबई
हमारे बीच बस इतनी दूरी थी कि मुझे उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाना था, पर मेरी गर्दन का दर्द कंधे से होता हुआ उँगलियों तक पहुँच चुका था। और उसके हाथों में शाम को घर लौटते वक़्त ख़रीदकर ले जाने वाले सामान की लिस्ट थी।
दर्द और लिस्ट के उस पार वो था… मैं थी… और हम दोनों का अनिच्छा और मजबूरी में उछाला हुआ जुमला था— “बाय!”
हमारे बीच बस इतनी दूरी थी कि मोबाइल के की-पैड के कुछ बटन दबाने थे। नंबर हमें मुँहज़बानी याद थे। पर… जब मुझे उसकी याद आई, मैं बच्चों का माथा चूमकर, यू-ट्यूब पर मन्ना डे, सलिल चौधरी और साहिर के गीत सुनते हुए आटा गूँथने लगी थी।
न जाने क्यों, ऐसे वक़्त गैस के चूल्हे से भी ऐसा धुआँ उठता, जैसे लकड़ी या गोइंठे पर घुमा-घुमाकर रोटियाँ फुला रही हूँ।
और शायद वो भी हाथों में चिल्ड बीयर थामे समाचार सुनने लगा हो, या फिर क्रिकेट देखने।
उस रात उसने अपनी पत्नी को कुछ ज़्यादा ही प्यार किया होगा और जब वो सो गई होगी, तो बालकनी में खड़े होकर अपने अनमने मन को मनाने के लिए सिगरेट सुलगाई होगी।
शायद… शायद…
(हम औरतें भी ख़ुद को दुखी करने की कितनी ख़ुशफ़हमी पाल लेती हैं… है न?)
हमारे बीच बस इतनी दूरी थी कि मैं उसके मनपसंद रंग का कपड़ा अब कभी नहीं… कभी नहीं पहनूँगी।
चूड़ियाँ पहनूँ, तो कलाई दुखती है। मोगरे की ख़ुशबू से माइग्रेन होता है।
और वो… वो… मेरे दिए हुए उपहार को स्टोर रूम में सारे कबाड़ के नीचे कहीं दबाकर रख चुका था।
जब मेरी याद आई होगी, घर की सफ़ाई के बहाने उपहार के डिब्बे खुले होंगे। टूटे-फूटे डिब्बों में यादों की पुरवाई क़ैद थी।
कुछ देर को मन बहला… फिर बहुत देर तक उदास रहा।
और फिर, “कितना कचरा भर रखा है!” कहकर स्टोर रूम में सब कुछ वापस रख दिया गया होगा।
सफ़ाई में जो चीज़ कूड़ेदान में जानी चाहिए थी, उसे फिर से सहेज लिया गया… अगली याद की सफ़ाई तक के लिए।
.हमारे बीच बस इतनी दूरी थी कि मैं दिन में कई दफ़ा उसके शहर का हाल-ख़बरों से जान लेती थी।
ख़बरें तय करती थीं मेरा ब्लड प्रेशर, मेरा तनाव, मेरी ख़ुशी… मेरा दुःख।
और वो मेरे शहर का ज़िक्र आते ही टीवी बंद कर देता होगा।
कहा करता था, “जिस गाँव जाना नहीं, उसका पता क्यों पूछना?”
बहुत कठकरेजी था… शुरू से ही।.
हमारे बीच बस इतनी ही दूरी थी कि मैं आम कहती थी, वो इमली समझता था।
और मैं उसके इमली कहने के न जाने कितने अर्थ तलाशती थी।
उसे हँसने, मेरा मज़ाक उड़ाने का बहाना मिल जाता—”ए हिंदी वाली!” कहकर मुझे ख़ूब खिजाता था।
अब भी शायद वैसा ही होगा।
उसे खिजाने में, चिढ़ाने में बड़ा आनंद आता था।
पर ऐसा करके अब उसे क्या सचमुच आनंद आता होगा?
हमारे बीच बस इतनी ही दूरी थी कि आख़िरी विदाई पर वो एक बार भी पलटकर नहीं देख सका।
बहुत कठकरेजी था… बहुत…
और मेरा हाथ तब तक हिलता रहा, जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गया।
पर वो आँखों से ओझल हुआ कहाँ?
आज भी हाथ अचानक हवा में उठ जाते हैं… और दूसरा हाथ उठे हुए हाथ को चिढ़ाते हुए गाता है—
“कोई नहीं है… फिर भी है मुझको न जाने किसका इंतज़ार…”
मुझे अपने दूसरे हाथ को अक्सर समझाना पड़ता है—
“इतना निर्मोही होना ठीक नहीं!”
हमारे बीच सिर्फ़… सिर्फ़… इतनी ही दूरी थी कि हथेलियाँ चौड़ी करके बित्ते से माप लेती।
हमारे बीच इतनी दूरी थी कि मापने की कोई इकाई उसे कभी माप नहीं सकती थी।
और वो… और वो दूरी कभी ख़त्म नहीं हुई।

धन्यवाद सर 🙏