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भीड़ में वह अनचाहा स्पर्श

भीड़भरी बस में अनचाहे स्पर्श और व्यक्तिगत सुरक्षा के प्रति जागरूक यात्री प्रतीकात्मक एआई चित्र

जब नजदीकी का बहाना बन जाता है सीमा लांघने का

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

बस में भीड़ है. ट्रेन में पैर रखने तक की जगह मुश्किल से मिल रही है. लोग एक-दूसरे से सटे खड़े हैं. ऐसे में कंधे से कंधा टकरा जाना या शरीर का हल्का-सा छू जाना स्वाभाविक है. लेकिन हर स्पर्श आकस्मिक नहीं होता. आप थोड़ा हटते हैं. सामने वाला भी हटने के बजाय फिर उतना ही करीब आ जाता है. आप अपनी जगह बदलते हैं, लेकिन कुछ क्षण बाद वही हरकत दोबारा होती है. यहीं से सामान्य भीड़ और जानबूझकर की गई बदसलूकी के बीच का अंतर समझना जरूरी हो जाता है.
हर स्पर्श गलत नहीं, लेकिन हर स्पर्श मासूम भी नहीं
सार्वजनिक परिवहन में शारीरिक दूरी बनाए रखना हमेशा संभव नहीं होता. अचानक ब्रेक लगने पर शरीर का टकराना, भीड़ में हाथ लग जाना या रास्ता बनाते समय किसी से छू जाना दुर्घटनावश हो सकता है. यदि कोई व्यक्ति आपके हटने के बाद भी बार-बार जानबूझकर आपके शरीर से सटने या रगड़ने की कोशिश करता है, तो इसे केवल भीड़ का परिणाम मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं. यह आपकी व्यक्तिगत सीमा का उल्लंघन हो सकता है.
आखिर कोई ऐसा क्यों करता है?
ऐसे व्यवहार के पीछे एक ही कारण नहीं होता. कुछ मामलों में व्यक्ति यौन उत्तेजना या संतुष्टि पाने के लिए जानबूझकर ऐसा कर सकता है. मनोविज्ञान में बिना सहमति दूसरे व्यक्ति से रगड़कर यौन उत्तेजना प्राप्त करने वाले व्यवहार को फ्रॉट्यूरिज़्म कहा जाता है. हालांकि केवल किसी घटना को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति किसी मानसिक या यौन विकार से पीड़ित है. इसका चिकित्सकीय निष्कर्ष केवल योग्य विशेषज्ञ ही दे सकते हैं.कई बार मामला किसी विकार का नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई यौन बदसलूकी, व्यक्तिगत सीमाओं की अनदेखी या दूसरे व्यक्ति की असहजता का फायदा उठाने का हो सकता है.
भीड़ क्यों बन जाती है आसान जगह?
भीड़ में एक तरह की गुमनामी होती है. सैकड़ों लोगों के बीच यह समझना कठिन हो सकता है कि स्पर्श जानबूझकर हुआ या गलती से. यही भ्रम कुछ लोगों को अनुचित व्यवहार का अवसर देता है.
बस, ट्रेन, मेट्रो, लिफ्ट, एस्केलेटर, बाजार या बड़े आयोजनों में सीमित जगह और लगातार होने वाली आवाजाही इस समस्या को और मुश्किल बना देती है.कई बार व्यक्ति सोचता है, शायद गलती से हुआ होगा. लेकिन जब वही घटना दोबारा और फिर तीसरी बार हो, तो अपनी असहजता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
महिला ही नहीं, पुरुष भी हो सकते हैं शिकार
अवांछित यौन स्पर्श को अक्सर केवल महिलाओं की समस्या मान लिया जाता है, जबकि पुरुष भी ऐसी घटनाओं का सामना कर सकते हैं.इस समस्या का मूल लिंग नहीं, बल्कि सहमति और व्यक्तिगत सीमा है. किसी महिला को यह अधिकार है कि कोई पुरुष उसकी अनुमति के बिना उसे न छुए. इसी तरह किसी पुरुष की व्यक्तिगत सीमा का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है.
ऐसी स्थिति में क्या करें?
सबसे पहले अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दें.
तुरंत दूरी बनाएं-अपनी जगह या सीट बदलें और संभव हो तो परिवारों या अधिक लोगों के बीच खड़े हों.स्पष्ट आवाज में रोकें- यदि स्थिति सुरक्षित हो तो कहें, मुझे मत छूइए, पीछे हटिए या आप बार-बार ऐसा कर रहे हैं. स्पष्ट आवाज आसपास के लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती है. किसी खास व्यक्ति से मदद मांगें. केवल कोई मदद करे कहने के बजाय किसी व्यक्ति की ओर देखकर कहें, आप कृपया मेरे पास खड़े हो जाइए या आप कर्मचारी को बुला दीजिए.
परिवहन कर्मचारियों को बताएं-बस कंडक्टर, ड्राइवर, ट्रेन या मेट्रो स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों को तुरंत जानकारी दें. जहां सहायता बटन या आधिकारिक शिकायत व्यवस्था उपलब्ध हो, उसका इस्तेमाल करें.
अकेले सामना न करें-यदि सामने वाला आक्रामक लग रहा है, तो उससे बहस या शारीरिक टकराव जरूरी नहीं. सुरक्षित जगह पर जाएं और दूसरों की मदद लें.
जरूरी जानकारी याद रखें- समय, स्थान, बस या ट्रेन का नंबर, कोच, स्टेशन और व्यक्ति का सामान्य हुलिया शिकायत के समय उपयोगी हो सकता है.
यदि घटना गंभीर या बार-बार हुई है, तो संबंधित परिवहन प्राधिकरण, सुरक्षा कर्मियों या पुलिस से शिकायत करने पर विचार करें. नाबालिग के साथ ऐसी घटना हो तो उसे तुरंत किसी भरोसेमंद वयस्क को बताना चाहिए.
सबसे महत्वपूर्ण बातआपको किसी के इरादे को अकेले साबित करने की जरूरत नहीं. यदि कोई व्यवहार आपको असुरक्षित महसूस करा रहा है, तो दूरी बनाना और मदद लेना पूरी तरह उचित है.
चुप्पी क्यों नहीं?
ऐसी घटनाओं के बाद शर्म, संकोच या ङ्गङ्घलोग क्या कहेंगेफफ का डर व्यक्ति को चुप करा सकता है. कई बार घटना इतनी अचानक होती है कि पीड़ित खुद भी तय नहीं कर पाता कि उसे तुरंत प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी या नहीं. हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है. इसलिए घटना के बाद खुद को दोष देना उचित नहीं.जागरूकता का अर्थ हर आकस्मिक स्पर्श को विवाद बनाना नहीं है. इसका अर्थ है आकस्मिक संपर्क और जानबूझकर की गई सीमा-लांघने वाली हरकत के बीच अंतर समझना.
एक छोटी-सी जागरूकता, बड़ा बदलाव
अगली बार भीड़भरी बस या ट्रेन में किसी का शरीर आपसे छू जाए, तो तुरंत निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं. लेकिन यदि आप हटें, वह फिर करीब आए, आप दूसरी जगह जाएं और वही हरकत दोबारा हो, तो अपनी असहजता को नजरअंदाज भी न करें.क्योंकि भीड़ में हर नजदीकी मजबूरी नहीं होती. कभी-कभी वह किसी की जानबूझकर चुनी हुई दूरी होती है. और किसी दूसरे की व्यक्तिगत सीमा का सम्मान करना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और सभ्य समाज की बुनियादी जरूरत है.

2 thoughts on “भीड़ में वह अनचाहा स्पर्श”

  1. ये बिमारी है और इस बिमारी का उम्र से कोई लेना-देना नहीं है । ज्वलंत मुद्दे पर अच्छा लिखा आपने 🙏

  2. यह बहुत सार्थक आलेख है और जो आपने लिखा वह पूरी तरह सच है।विशेष कर स्त्रियों को झेलना पड़ता है, आपने पुरुषों की बात भी की है वह भी संभव है ही.

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