
अनुपमा भार्गव
बोलो बोलो, कुछ तो बोलो,
अंतर्मन की आँखें खोलो।
छाया है चहुँ ओर अँधेरा,
चुप रहने से वो और गहरा हो जाएगा।
सुख का सूरज न निकलेगा,
दुःख गहरा होकर बढ़ जाएगा।
इस धरती माँ पर सबका हक है,
पशु-पक्षी और अमीर-गरीब।
कुछ ने सब कुछ दबा लिया है
और कुछ हैं शोषित, पीड़ित।
साथ सदा दो निर्बल का,
खुद को सत्कर्मों से जोड़ो।
बोलो बोलो, कुछ तो बोलो,
अंतर्मन की आँखें खोलो।
खुद के हक में सभी बोलते,
तुम औरों के हक में बोलो।
जो अनपढ़ हैं, दबे हुए हैं,
उनकी भी तुम आँखें खोलो।
वैसे भी इस भौतिक युग में
संवादहीनता है गहराई।
मेरा और सिर्फ मेरा हित हो,
सभी जानते ये चतुराई।
यदि समझकर भी चुप बैठे तो
बढ़ती जाएगी निठुराई।
मानवता थोड़ी-सी बची है,
वो भी जाएगी धरती में समाई।
जहाँ बोलना आवश्यक हो,
मत चुप रहो, हिम्मत से काम लो।
अन्याय और अनीति का
जमकर करो प्रतिकार।
पकड़ो निर्बल का हाथ और
दिलवाओ उसे उसका अधिकार।
यदि तुम्हारे बोलने से
जीवन किसी का सँवरता है,
तभी सार्थक है ज्ञान तुम्हारा,
जब वो परोपकार के मार्ग
से गुजरता है।
पेड़ों और नदियों से सीखो
परोपकार का पाठ।
ये सिर्फ देते हैं सबको,
कितने हैं उदात्त।
जहाँ जरूरी बोलना है,
यदि वहाँ भी चुप रह जाओगे,
तुम भी वक्त आने पर फिर
निपट अकेले रह जाओगे।
बोलो कि बोलना निशानी
मानवता की है।
बोलो कि बोलना निशानी
जीवित प्राणी की है।
