बोलो कुछ तो बोलो
अनुपमा भार्गव बोलो बोलो, कुछ तो बोलो,अंतर्मन की आँखें खोलो।छाया है चहुँ ओर अँधेरा,चुप रहने से वो और गहरा हो जाएगा।सुख का सूरज न निकलेगा,दुःख गहरा होकर बढ़ जाएगा। इस धरती माँ पर सबका हक है,पशु-पक्षी और अमीर-गरीब।कुछ ने सब कुछ दबा लिया हैऔर कुछ हैं शोषित, पीड़ित।साथ सदा दो निर्बल का,खुद को सत्कर्मों से…
