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प्यासी पलकें

प्यासी पलकें प्रेम और विरह पर आधारित हिंदी कविता प्रेम की प्यास, इंतजार की बेचैनी

सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

मेरे इन प्यासी पलकों पर
ख्वाब सुनहरे किसके हैं?
क्या वही हैं, जिनकी ख़ातिर
हम रात-रात भर सिसके हैं?

एक क्षण कभी ऐसा न बीता,
जब न आए तुम सुधियों में।
तेरी चाहत कुछ और ही थी,
हम न थे उन रतियों में।

इस अहमक की परिधि से
तुम तो कोसों दूर रहे,
फिर भी इस बिरहन के
तुम ही तो नैनों के नूर रहे।

प्रेम, प्रीत, चाहत, अनुरागी
ये चकोर ही बन सकता है।
उसकी बातें, वो ही जाने,
किसकी क्या विवशता है।

रह गई उस पपीहे की भाँति,
पानी के मध्य भी प्यासी।
तृषित उर की प्यास बुझाने,
नहीं बनी किसी की दासी।

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