जाग रे इंसान

गुरु मनुष्य को समझाते हैं कि हे इंसान, अब सो मत, जाग जा। तेरे जीवन का अधिकांश समय काम और जिम्मेदारियों में बीतता है, परंतु यदि तू तेईस घंटे कर्म करता है तो एक घंटा प्रभु के ध्यान के लिए अवश्य निकाल। यही तेरे जीवन का सच्चा संतुलन है।

मनुष्य का यह शरीर नौ द्वारों से बना है, जिनसे वह सांसारिक कार्य करता है। परंतु जब वह शब्द-ध्वनि के माध्यम से दसवें द्वार से जुड़ता है, तब उसे भगवान का साक्षात्कार होता है। यही शाश्वत सत्य है।शब्द ही वह शक्ति है जिसने धरती और आकाश को थाम रखा है। सृष्टि की जननी शब्द है, और शब्द ही प्रकाश देता है। जो इस सत्य को पहचान लेता है, वही ईश्वर की निकटता को प्राप्त करता है।
जो मनुष्य तन और मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता, वह कालचक्र में फँसा रहता है। ऐसा व्यक्ति जीवन भर संघर्ष करता है और अंततः उसे सबकुछ त्यागकर जाना पड़ता है।

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कन्हैया

मैं कन्हैया को ढूँढ रही हूँ। घर, बाहर, देहरी, हर द्वार पर तलाश करती हूँ, पर न जाने किन कुंज-गलियों में वह छिपा हुआ है, मानो आज फिर मटकी फोड़ने आया हो।वह तनिक भी पास नहीं आता। छलिया रोज़ कोई न कोई छल करके निकल जाता है। मैं मथ-मथकर माखन तैयार करती हूँ, पर पता नहीं वह इसे कैसे भोग लगाता है।वह चोर की तरह घर के भीतर आ जाता है, हंडिया से माखन ले जाता है। मैं सोचती हूँ कि उसे कैसे पकड़ूँ, लेकिन वह तो क्षण भर में अदृश्य हो जाता है। अब तो कोई उपाय बताओ। उस माखन चोर को ढूँढकर लाओ। नंद बाबा से जाकर कोई कहो, ताकि मेरे इस व्याकुल हृदय को चैन मिल सके।

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