gulmohar
विजयादशमी पर जलते रावण के पुतले के सामने आत्ममंथन करता व्यक्ति

जलते पुतले, बढ़ते रावण

विजयादशमी केवल रावण का पुतला जलाने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें दूर करने का अवसर भी है। यह कविता लोभ, अहंकार, छल, अन्याय और टूटते विश्वास पर सवाल उठाते हुए सच्चे विजयादशमी पर्व का अर्थ समझाती है। संदेश स्पष्ट है जब तक मन का रावण जीवित है, तब तक वास्तविक विजय अधूरी है।

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