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आन है हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि देश का सम्मान और अभिमान है। इसमें प्रेम बसता है, स्वरों की मधुर तान गूंजती है और हर शब्द अपनी सरस लय से हृदय को छू लेता है। यह हमारी सभ्यता और सरल आचरण की पहचान है, जो चरित्र को निखारती और राष्ट्र की शान को बढ़ाती है। हिंदी के बिना ज्ञान अधूरा है, इसलिए इसे सदा सर्वोपरि रखना ही हमारा कर्तव्य है।

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क्या मैं बहक गई थी…?

मैं बहक गई थी और यह मानने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं। जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मेरा पति मुझसे दूर था। उसी खालीपन में एक पुराना प्यार फिर से सामने आया, जिसने मुझे वह अपनापन दिया जो मैं भूल चुकी थी। उस एक सच ने हमारी शादी को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे आईना दिखा गया।

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पचास वर्ष की महिला और उसके मित्र की आत्मीय बातचीत, सच्ची दोस्ती और नई उम्मीद पर आधारित भावनात्मक हिंदी कहानी।

 एक मौसम फिर लौट आया…

पचास वर्ष की सुमेधा ने जीवन से उम्मीद करना लगभग छोड़ दिया था। तभी एक साहित्यिक समूह में उसकी मुलाकात विनय से हुई। धीरे-धीरे यह मित्रता उसके सूने मन में विश्वास और अपनापन के नए अंकुर उगाने लगी। समाज के सवालों और सीमाओं के बीच भी दोनों ने महसूस किया कि कुछ रिश्तों को नाम की नहीं, सच्ची संवेदनाओं की जरूरत होती है। यह कहानी बताती है कि जीवन की शाम में भी दोस्ती और आत्मीयता इंसान को फिर से जीना सिखा सकती है।

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पेड़ तो वही है, पर तुम बदल गए हो

मन्नत का धागा

“पेड़ तो वही है, पर तुम बदल गए हो…” प्रेम, इंतज़ार, तन्हाई और अधूरी चाहत की पीड़ा को व्यक्त करती यह कविता दिल की गहराइयों को छू जाती है। मन्नत के धागे से शुरू होकर प्रेम के दर्द तक की भावनात्मक यात्रा का मार्मिक चित्रण।

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मीरा के नाम ख़त

मीरा के जीवन और भक्ति को याद करते हुए लेखिका अपने भीतर उठते असंख्य प्रश्नों से जूझती है। बिना देखे कृष्ण पर किया गया अटूट विश्वास, सांसारिक सुखों का त्याग और विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को अक्षुण्ण रखना मीरा की भक्ति आज भी मन को विस्मित और प्रेरित करती है।

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प्रकृति के बीच खड़ी मुस्कुराती महिला

तेरे आँगन का उजियारा…

यह कविता प्रेम की उस कोमल अनुभूति को व्यक्त करती है, जहाँ प्रिय का सौंदर्य प्रकृति के हर रूप में झलकता है। कभी वह सूरज की उजास बनकर सामने आता है, तो कभी झरने की मधुर ध्वनि सा मन को स्पर्श करता है।

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महेश शुक्ला: दोस्ती, डांट और प्यार का अनोखा सफर

पुणे की मंडली आज भी कर रही इंतजार अकोला में बैठे हैं अपने ‘डॉन’ महेश शुक्ला

आप मुझे ढूंढ रहे हो और मैं आपका यहां इंतजार कर रहा हूं..ये दोनों डायलॉग अमिताभ बच्चन की फिल्मों में एक में उनका इंतजार हो रहा है दूसरे में वो किसी का इंतजार कर रहे हैं. एकदम कंट्रास्ट. एक दम उलट. वैसे ही हमारे अग्रज, हमारे सहयोगी, हमारे आशीर्वाद दाता महेश शुक्ला भी एकदम कंट्रास्ट है. वे जैसे हैं वैसे दिखते नहीं… जैसे दिखते हैं वैसे हैं नहीं. 60 की उम्र के बाद भी (असली उम्र नहीं बताउंगा) यदि किसी ने उनके प्रति इस बात के लिए सहानुभूति जताई कि वे बुजुर्ग हैं तो भले ही आपको मुंह पर कुछ नहीं कहे लेकिन मन में जरुर कहेंगे बुड्ढा होगा तेरा बाप… क्योंकि इस उम्र में भीशख्सियत हेलमेट लगाकर जब केटीएम जैसी स्पोर्टस बाइक चलाते हैं तो अच्छे-अच्छे युवाओं को पीछे छोड़ देते हैं.

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वो साल अच्छा था

“न ये हाल अच्छा है न वो हाल अच्छा था, इस साल से कह दो कि वो साल अच्छा था! इफरात में मिली मोहब्बत को जेब में रखने की जगह न थी, फटी जेब और तंग हाल ही अच्छा था।”

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एक पर्यावरणविद् मंच पर भाषण देते हुए, पीछे लक्ज़री कार का दृश्य

वे बेचारे……

यह व्यंग्यात्मक लेख आधुनिक समाज में बढ़ते दिखावटी पर्यावरणवाद और नैतिक पाखंड पर तीखा प्रहार करता है। कहानी एक ऐसे गुरुजी से शुरू होती है, जो गांव की पाठशाला में बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और सादगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके आदर्श, उनके विचार और उनका जीवन सब कुछ इतना प्रभावशाली होता है कि लोग उन्हें भगवान जैसा मानने लगते हैं।

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एक महिला रात में टीवी देखते हुए अतीत की यादों में खोई हुई है, उसके चेहरे पर हैरानी और भावनात्मक तनाव साफ दिखाई दे रहा है।

अब क्या होगा -3

एक सस्पेंस और इमोशनल हिंदी कहानी रीता मिश्रा तिवारी भागलपुर लाइट ऑन करने पर देखा तो दरवाजे पर गिरी पड़ी थी शेफाली..!आवाज़ लगाई पर कोई हरकत नहीं। पानी का छींटा मारा..!” क्या कर रही पागल हो गई है..जगा दिया कितना प्यारा सपना देख रही थी”हड़बड़ा कर उठ बैठी शेफाली। “थैंक गॉड मेरी तो जान ही…

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