कोई लौटा दे मेरे… वो स्कूल के दिन!

पैदल स्कूल जाना, बिना ट्यूशन के पढ़ाई, सादगी भरा जीवन और माता-पिता की निश्चिंतता। सुविधाओं की कमी के बावजूद उस दौर में संतोष, आत्मनिर्भरता और खुशियों की भरपूर अनुभूति थी, जो आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में दुर्लभ हो गई है।

Read More
वीणा धारण किए श्वेत कमल पर विराजमान माँ सरस्वती का दिव्य और शांत स्वरूप।

सरस्वती वंदना

हे स्वामिनी, ज्ञानदायिनी, भक्ति-प्रकाश उर में भर दे। माँ सरस्वती से ज्ञान, विवेक, संयम और शुद्ध लेखनी का वरदान माँगती यह सुंदर वंदना मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है।

Read More

…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

Read More

उखड़ने के बाद भी ना हारा… देखिए इस पीपल की जिद!

जड़ों से उखाड़े जाने के बाद भी मुस्कुराना कैसे संभव है, यह सांवेर रोड की पहाड़ी पर लगाए गए पीपल के तने से सीखा जा सकता है। बिना शाखाओं के रहकर भी उसने हरियाली का संदेश दिया है। नगर निगम की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण बचाने की मिसाल है, बल्कि पेड़ ट्रांसप्लांटेशन की एक प्रेरणादायक कहानी भी है।

Read More

एक सफ़र ऐसा भी….

ट्रेन में मिली उस नीली आँखों वाली उदास महिला ने जाते-जाते एक सवाल छोड़ दिया “क्या ब्याहतों के पर काट दिए जाते हैं?” उसकी मुस्कान कुछ पल की थी, बस उतनी देर जितनी देर कोई सावन अपनी बरसात रोक कर खिड़की से झाँकता है। वह स्टेशन पर उतर गई, और मैं सोचता रह गया . कितनी स्त्रियाँ अपनी आँखों में बरसात को कैद करके जी रही हैं, जैसे उन्हें कभी बरसना ही न हो।

Read More

त्यौहार

त्यौहार का समय फिर से आया। हल्दी-कुमकुम का त्यौहार आया, सुहागिनों ने श्रृंगार किया, गजरा सजाया, माथे पर बिंदी लगाई, हरि-हरी चूड़ियाँ पहनी, हाथों में मेहंदी लगी और गोटा वाली साड़ियाँ पहनीं। पर उस विधवा ने न तो चमकीली साड़ी पहनी, न ही टीका सजाया, और उसके हाथ भी खाली थे। एक बहन थी, जो पति की सताई हुई थी, वह दरिंदे को छोड़कर घर वापस चली आई। सगुना भी रह गई थी, बिन ब्याही, क्योंकि ग़रीब बाबा उसकी सगाई नहीं कर पाए थे।
उनके हाथों में मेहंदी नहीं थी, पांवों में पायल नहीं थी, चूड़ियों की खनक भी नहीं थी। वह सभी भावों से घायल थीं। उन्हें हल्दी-कुमकुम में जाने की मनाही थी। सब बेरंग, गुमसुम और मुरझाई हुई थीं। वेदना की बूँदें उनकी आँखों में समाई हुई थीं।। सभी को हर त्यौहार पर समान अधिकार मिले। तभी पुरुष प्रधान समाज में भी सभी नारियों का सम्मान होगा और रंग भरी क्यारियाँ सुरभित होंगी।

Read More
"Young men and women celebrating New Year’s Eve at a hotel lawn in India, dressed in party clothes under colorful lights, with a festive yet chaotic atmosphere reflecting modern urban nightlife."

ज़ीरो नाइट

हर साल शहरों के होटलों में ज़ीरो नाइट भव्यता से मनाई जाती है, लेकिन इस बार युवा लड़कियों ने नशे में अपनी मर्यादा खो दी। नशे और तेज़ गाड़ी के कारण कई दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें परिवारों की खुशियाँ भी मिट गईं। यह घटनाएँ समाज और संस्कृति पर प्रश्न खड़े करती हैं।

Read More
गांव के आंगन में एक लड़की चाय का कप पकड़े, सामने भावुक खड़ा एक युवक, हल्की धूप और भावनात्मक माहौल

अधूरी चाय, अधूरा इश्क़

चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।

Read More