रावण दहन

यह लेख रावण दहन की पौराणिक कथा को जीवंत और संवादात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि रावण केवल एक राक्षस नहीं बल्कि विद्वान और शिवभक्त था, पर अहंकार और लालच के कारण उसका संहार निश्चित था। लंका युद्ध के समय देवी दुर्गा की पूजा और हनुमानजी की चतुरता से रावण का यज्ञ विफल हुआ और उसका संहार सुनिश्चित हुआ। इस कथा के माध्यम से विजया दशमी केवल पुतला जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बन जाती है।

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रावण का कद बढ़ रहा है ?

यह लेख दशहरे के प्रतीक रावण के पुतले को मात्र लकड़ी और कागज़ का नहीं बल्कि समाज में बढ़ते अहंकार, लालच, क्रोध और दिखावे का प्रतीक बताता है। जैसे-जैसे पुतले का कद हर साल बढ़ता है, वैसा ही हमारे विचारों और आचरण में भी बुराई का आकार बढ़ रहा है। असली विजयादशमी तब होगी जब हम केवल पुतले जलाने तक सीमित न रहकर अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध को जलाएँ, दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और सादगी, सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बनाएँ। लेख समाज में व्याप्त बुराई और दिखावे के प्रति चेतावनी देते हुए पाठकों को आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है।

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रामायण गाथा : धर्म की विजय

यह पद्यांश रामायण की मुख्य घटनाओं का संक्षिप्त और भावपूर्ण चित्रण करता है। इसमें वर्णन है कि दशरथ के प्रिय पुत्र श्रीराम ने पिताजी की आज्ञा का पालन करते हुए राजपाट त्यागकर सीता और लक्ष्मण के साथ वनगमन किया। स्वर्ण मृग की माया से सीता का हरण रावण ने साधु का वेश धरकर किया, जिसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण व्याकुल होकर वन-वन सीता की खोज में निकले।

मार्ग में घायल जटायू मिले, जिन्होंने अपने प्राण त्यागकर सीता हरण का समाचार दिया। आगे चलकर श्रीराम को हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना का सहयोग मिला। हनुमान ने सीता को खोजकर उनकी निशानी अंगूठी पहुँचाई और लंका दहन किया। नल-नील की सहायता से समुद्र पर सेतु का निर्माण कर श्रीराम की सेना लंका पहुँची। वहाँ भीषण युद्ध हुआ, जिसमें रावण का वध कर धर्म की विजय स्थापित की गई। अंततः देवताओं और ऋषियों ने प्रभु राम का गुणगान किया और उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में वंदित किया।

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शिव शक्ति

शिव ही सत्य हैं और सत्य ही शिव हैं। उनकी पहचान सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के रूप में होती है। शिव ही शक्ति हैं और शक्ति ही शिव—दोनों एक ही माला के अनमोल मोती हैं जिनसे संपूर्ण विश्व आलोकित होता है। ब्रह्मा जी ने शिव की प्रेरणा से ही ब्रह्मांड की रचना की और विष्णु जी को सृष्टि के पालन का दायित्व भी शिव ने ही प्रदान किया। सृष्टि का संहार स्वयं शिव के हाथ में है। यही इस सृष्टि का सत्य है। परंतु सदाशिव का प्राकट्य कैसे हुआ—इसका प्रमाण शास्त्रों में नहीं मिलता, क्योंकि वे अनादि और अनंत हैं। त्रिकालदर्शी सदाशिव सबसे बड़े प्रशासक और प्रबंधक हैं, जो सबको उनके उत्तरदायित्व सौंपते हैं और सबके कार्य पर सतर्क दृष्टि रखते हैं। समय-समय पर समीक्षक बनकर और कभी तिर्यक दृष्टि से देखकर वे सभी की सहायता को तत्पर रहते हैं। वास्तव में शिव शब्दातीत और अवर्णनीय हैं—उनकी महिमा अपरंपार है। यही स्मरणीय है कि शंकर ही सदा सेवनीय हैं और वही सभी दुःखों का हरण करने वाले हैं।

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कालरात्रि माँ

“गर्दभ वाहन पर विराजित, खड्ग-खप्परधारी कालरात्रि माँ, शत्रु का दमन करने वाली और भक्तों को समृद्धि देने वाली माता। सप्तम दिन पूजा करने से दूर होती हैं बाधाएँ, और अर्पित रक्त पुष्प व शहद से होती है शुभ फलप्राप्ति।”

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मातरानी के अनन्य स्वरूप

मातारानी की महिमा असीमित और अनन्य है। सृष्टि की हर क्रियाशीलता में उनका वंदन और पूजन होता है। दया, शांति, चेतना और सामर्थ्य के प्रतिरूप के रूप में, माँ ज्ञान से पूर्ण प्रकाशपुंज हैं। वह जीवन की सर्वशक्तिप्रदायिनी हैं, जो समस्त जगत की असुरी शक्तियों का संहार करती हैं और यश, रूप, आरोग्य व सौभाग्य प्रदान करती हैं।

माँ अमिय-स्रोत जैसी निरंतर नाद करती हैं और दुष्टों का दमन करने के लिए विकराल रूप धारण कर लेती हैं। प्रचंड दामिनी और रमा कामिनी के स्वरूप में वह भक्तों के हर संताप को हरती हैं और उनके मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

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मां कुष्मांडा की स्तुति

“बुध ग्रह की स्वामिनी, ममता का रूप धारण करने वाली मां कुष्मांडा, भक्तों को रूप-बुद्धि प्रदान करती हैं और अष्टभुजा से दुष्टों का संहार करती हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर पीले रंग का पूजन, केसर पेड़ा और मालपुए का भोग अति प्रिय है।”

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माँ शैलपुत्री

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र) प्रथम शैलपुत्री देवी,आज नवरात्र में कृपा बरसाए माँ।भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। पहला दिन शैलपुत्री स्वरूप,पर्वतराज हिमालय की पुत्री तू।पूर्व जन्म में राजा दक्ष की थी पुत्री,तब माँ का नाम पड़ गया था सती।। तेरी महिमा सारी कह न सके माँ,भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। सती…

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नवरात्रि: भक्ति से शक्ति की यात्रा

“नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह हमें हमारे भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने, हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखने और आत्मविश्वास से अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।”

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नवरात्रि पर्व का हिन्दू धर्म में महत्त्व

“नवरात्रि का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मबल और मानवीय जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला पर्व है। नौ रातों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना से भक्त अपने जीवन में शक्ति, साहस, ज्ञान और भक्ति का विकास करते हैं। उपवास और संयम शरीर को शुद्ध करते हैं, जबकि ध्यान, पूजा और मंत्रजप मन और आत्मा को पवित्र बनाते हैं।

यह पर्व हमें यह शिक्षा देता है कि सत्य और धर्म की विजय निश्चित है, जबकि असत्य और अधर्म का अंत होना अवश्यंभावी है। नवरात्रि का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—देशभर में गरबा, डांडिया और रामलीला जैसे उत्सव समाज में उत्साह, एकता और सहयोग की भावना जगाते हैं। साथ ही, यह पर्व स्त्री-शक्ति के आदर और सम्मान का प्रतीक है, जो हमें याद दिलाता है कि नारी केवल स्नेह और ममता की मूर्ति नहीं, बल्कि संकटों का सामना करने वाली साहस और संकल्प की प्रतिमूर्ति भी है।

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