Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

पितरों की तस्वीर: कहाँ और कैसे लगाएं

घर में पितरों की तस्वीर लगाने का उद्देश्य सिर्फ स्मरण करना नहीं, बल्कि वास्तुशास्त्र के अनुसार सही दिशा और स्थान पर रखकर घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखना है। गलत स्थान या दिशा पर तस्वीर लगाने से वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है। इसलिए पितरों की तस्वीर को उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में, दक्षिण की ओर मुख करके रखना सर्वोत्तम माना जाता है।

Read More

भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

Read More

मौन..

जब मन, शरीर और आत्मा एकसमान और संतुलित स्थिति में होते हैं, तब वास्तविक मौन का अनुभव होता है। ध्यान और मौन के अभ्यास से हम न केवल अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं, बल्कि ब्रह्मांड की शक्तियों और जीवन के गहरे रहस्यों से भी परिचित हो सकते हैं। नकारात्मक विचारों की तरह मन की उर्जा भी बिखरती रहती है, जिससे निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। इसे शांत और सकारात्मक विचारों से भरकर, हम अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ा सकते हैं और आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यह अभ्यास निरंतरता और धैर्य मांगता है, पर धीरे-धीरे यह सुखद अनुभव और गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों का मार्ग खोलता है।

Read More

कब तक रहोगे चुप-चुप यूँ…

कब तक हम चुप रहेंगे? समय आ गया है कि हम अपनी ज़ुबान खोलें और केवल श्रृंगार-रस में खोए रहने के बजाय वीरता का स्वर बुलंद करें। चारों ओर रक्त बह रहा है, हालात भयावह हो चुके हैं, और हमें शत्रुओं की चालों को तोड़ने के लिए नई युक्तियाँ ढूँढ़नी होंगी।

आज बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। भेड़िए जैसी नज़रें हर ओर लगी हुई हैं, और माँओं की नींद उड़ चुकी है। आँखें मूँदकर अब और चुप नहीं रहा जा सकता।
हर दिन आपसी बैर और नफ़रत बढ़ाने की साज़िशें होती रहती हैं। यह समय है कि हम किसी बहकावे में न आएँ और नफ़रत की दीवारें तोड़ दें। श्रोताओं को भी सुनकर अमल करना होगा और कवियों को केवल कहने भर पर नहीं, बल्कि पालन करने पर भी ज़ोर देना होगा। तभी शब्दों की असली शक्ति सामने आएगी और बंद पड़े हृदय खुल पाएँगे।

Read More

बड़की

संयुक्त परिवार की रसोई सिर्फ़ खाना पकाने की जगह नहीं होती, वहाँ रिश्तों की आँच भी सुलगती है।
सुनीता को आज समझ आया कि कमाना ही पर्याप्त नहीं, घर के कामों में हाथ बँटाना भी उतना ही ज़रूरी है। बड़ी भाभी ललिता की चुप्पी में शिकायत नहीं, थकान छिपी थी उस जिम्मेदारी की जो उन्होंने बरसों से बिना शोर उठाई थी। कभी-कभी रिश्तों में तकरार इसलिए नहीं होती कि कोई गलत है, बल्कि इसलिए कि कोई दूसरे की थकान देख नहीं पाता।

Read More
“1990 के दशक का भारतीय घर जिसमें टेपरिकार्डर, कैसेट और मटके पर रखा स्पीकर देसी जुगाड़ साउंड सिस्टम के रूप में इस्तेमाल हो रहा है”

बेबी को बेस पसंद है

स सिर्फ़ आवाज़ नहीं होता, वह एक जुनून होता है। टेपरिकार्डर, कैसेट और जुगाड़ से पैदा हुआ वह गूंजता बेस, जो साधारण मशीन को भी महफिल बना देता था। मटके पर उल्टा रखा स्पीकर सिर्फ़ प्रयोग नहीं था, वह उस दौर की रचनात्मक ज़िद थी जहाँ साधन कम थे, पर शौक़ और शरारत दोनों भरपूर थे। और हाँ, घर से थोड़ी दूर रहने वाली ‘बेबी’ को भी वही बेस पसंद था।

Read More

परवरिश…

परवरिश, दरअसल वह निरंतर साधना है जहाँ संतान रूपी बीज को हम प्रेम, स्नेह और संस्कार की सिंचाई से अंकुरित करते हैं। समय-समय पर उचित मार्गदर्शन और देखभाल से यह पौधा धीरे-धीरे एक ऐसे वृक्ष में बदलता है, जो भविष्य में न केवल जिम्मेदार और संवेदनशील होता है, बल्कि समाज और परिवार के लिए फलदायी भी सिद्ध होता है।

Read More

मकाँ

एक जर्जर मकाँ खंडहर की तरह ढहता दिखाई देता है। कभी उसी छत के नीचे बच्चों की चहचहाहट गूँजती थी, माँ और बाबा की बातें घर को जीवंत बना देती थीं। आज वातावरण उदासी और रंजो-ग़म से भरा है, मानो साँसें भी उखड़-सी गई हों। दिल बार-बार उसी पुराने आशियाने को ढूँढता है, जहाँ अपनापन और जीवन की गर्माहट हुआ करती थी।

Read More