समानता की आड़ में लुप्त होती संस्कृति

समानता और स्वतंत्रता आज के समय के आवश्यक मूल्य हैं, परंतु जब इन्हें जिम्मेदारी और सांस्कृतिक मर्यादाओं से अलग कर दिया जाता है, तब समाज में असंतुलन पैदा होता है। भारतीय संस्कृति स्वतंत्रता के विरोध में नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और कर्तव्य के साथ जीवन जीने की सीख देती है। आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। संस्कृति हमें बाँधती नहीं, बल्कि सही दिशा देती है और जो समाज अपनी संस्कृति को भूल जाता है, वह भीतर से खोखला हो जाता है।

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तुम कितना बदल गए हो

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

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मुकेश “कबीर” को मिला राष्ट्रीय कलम गौरव सम्मान

देश के सुप्रसिद्ध गीतकार और व्यंग्यकार मुकेश “कबीर” को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ, प्रयागराज द्वारा राष्ट्रीय कलम गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया।

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हरी दूब

“हरी दूब” कविता जीवन की आपाधापी में सुकून के छोटे-छोटे क्षणों की तलाश है, जहाँ आकाश के बदलते रंग, श्रमिक की दुआ और घास की मुलायम हरियाली मिलकर मनुष्य को ठहरने और महसूस करने का अवसर देते हैं।

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

जिसने अक्षर नहीं, जीवन पढ़ाः मेरी मां

बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर जीवन की भाषा उन्हें पूरी तरह आती थी। बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें समय से पहले माँ बना दिया। स्वाभिमान उनकी साँसों में था और ममता उनके कर्मों में। टूटकर भी न बिखरने वाली इस स्त्री ने चुपचाप पूरा घर थामे रखा और अंत में, हरी रेखाओं के बीच, अपने होने का आख़िरी संकेत दे गई।

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‘नामाचा गजर’ ‘नामाचा गजर’

कलाश्री संगीत मंडल द्वारा आयोजित ‘नामाचा गजर’ कार्यक्रम 6 जुलाई को एरंडवणे स्थित शकुंतला शेट्टी सभागृह में आयोजित किया जाएगा। पं. रघुनाथ खंडाळकर अपने पुत्रों के साथ प्रस्तुति देंगे, साथ ही पं. भीमसेन जोशी के पुत्र श्रीनिवास जोशी और पोते विराज जोशी भी मंच पर नजर आएंगे।

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जिंदगी भर नहीं भूलेगी मेट्रो की वो रात…

एक भागती-दौड़ती मुंबई की रात में, मैं मेट्रो के सफर पर थी, अपने बैग और गिफ्ट बॉक्स के साथ, साड़ी में शाही अंदाज़ लिए। एक अजनबी सज्जन ने बिना किसी शब्द के मेरी मदद की, मेरा सामान लौटाया और बाद में टिकट लेने में भी सहायता की। हमारी अनौपचारिक बातचीत, मुस्कानें और छोटे-छोटे इशारे उस रात को यादगार बना गए। सफर के बीच हमारी बातचीत इतनी सहज और हल्की थी कि समय का पता ही नहीं चला। उनके व्यवहार में न तो अश्लीलता थी, न कोई लालसा सिर्फ मित्रवतता और आदर।

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शहर बनते गाँव का दृश्य, जहाँ पक्के मकानों के बीच अकेलापन और रिश्तों की दूरी दिखती है

मिट्टी की खुशबू रोती रही

यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।

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सुबह की रोशनी में लकड़ी की मेज पर रखा गर्म चाय का कप, हल्की भाप उठती हुई, पास में चाय की पत्तियां और शांत वातावरण

चाय: एक कप में सेहत, सुकून और लंबी उम्र का राज

चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि सेहत और सुकून का मेल है. सही समय, सही तापमान और सही मात्रा में पी गई चाय दिल, मेटाबॉलिज़्म और इम्युनिटी को मजबूत बनाती है, जबकि गलत आदतें इसके फायदे को नुकसान में बदल सकती हैं. यह लेख बताता है चाय पीने का वैज्ञानिक और स्वास्थ्यवर्धक तरीका.

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“कभी खुद के लिए भी जी ले माँ…”

जाने हमेशा ऐसा क्यों लगता है सारे असंभव काम आप ही कर सकती हो… जादुई सी बेतरतीब से बंधे माँ के जूडे से हमेशा बाल की एक पतली सी लट छूट जाया करती थी, जो पसीने से गर्दन में चिपकी रहती। इतनी गर्मी में रोटियां बनाते हुए माँ पसीने से नहा उठती। सब काम निपटा…

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