जो ठहर गए, वही असली कहानी हैं

सत्तर वर्ष की उम्र में जीवन ने सिखाया कि लोग आते-जाते रहते हैं, कुछ बसंत की तरह उजास और उम्मीदें लाते हैं, कुछ शीत की आँधी की तरह चले जाते हैं। युवावस्था में हर विदाई पीड़ादायक लगती थी, लेकिन समय और अनुभव ने यह समझाया कि जो लोग आपके लिए बने हैं, वे हमेशा लौटकर आते हैं। असली खुशी और जीवन की कहानी उन लोगों में है जो आपके साथ ठहरते हैं, आपकी आत्मा को समझते हैं और बिना किसी जोर-जबरदस्ती के आपके जीवन में बने रहते हैं।

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मन 

यह कविता रिश्तों में पसरी हुई खामोशी और मन की गहराइयों में उपजी पीड़ा का चित्रण करती है। कवि कहता है कि यह खामोशी, मन को एक निर्जल और सूने कुएँ में धकेल देती है, जहाँ आकुलता और विकलता का साया छा जाता है। वहाँ न कोई चाहत होती है, न उम्मीद—नव अंकुर फूटने की संभावना भी नहीं।मन के किसी कोने में आशाएँ और अभिलाषाएँ सुंदर यादों की पोटली बनकर धरी रह जाती हैं। हर अहसास धीरे-धीरे पिघलकर पतझड़ के मौसम में बदल जाता है, और अंततः यह मन एक बांझ धरा की तरह फट पड़ता है।

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•••प्रेमानंदजी ने लुटाए आंसुओं के मोती

राधारानी के परम भक्त-वृंदावन वाले संत प्रेमानंद जी के प्रवचनों के दीवाने तो पूरे विश्व में हैं। वृंदावन स्थित प्रेमानंद महाराज के आश्रम में उनके दर्शन की एक झलक पाने को ब्रह्म मुहूर्त से हजारों श्रद्धालु जुट जाते हैं। ऐसे माहौल में खुद प्रेमानंद जी इंदौर के श्रद्धालु अतुल तिवारी परिवार को मिलने का समय दिया, उनकी मंत्रमय शंख ध्वनि को एकांत में सुना और सुनते-सुनते भाव विह्वल हो गए।

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‘बेरंग’ ने खोले किशोरों के मन के दरवाज़े

सिर्फ बस्तियों या निम्न वर्गों में नहीं, बल्कि समृद्ध समाजों में भी किशोर अपराध देखने को मिलते हैं। हम तब ही इस पर चर्चा करते हैं जब कोई बड़ा हादसा हो, जैसे हाल ही में पुणे की पोर्श दुर्घटना। लेकिन हमें ऐसे मामलों की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। सभी सामाजिक पृष्ठभूमि के बच्चों को समझने की जरूरत है।” यह विचार प्रसिद्ध लघु फिल्म निर्देशक राहुल पनशिकर ने नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया (NFAI) में अपनी लघु फिल्म ‘बेरंग’ की विशेष स्क्रीनिंग के अवसर पर व्यक्त किए।यह फिल्म किशोरों की मानसिक और भावनात्मक जद्दोजहद को संवेदनशील तरीके से दर्शाती है।‘बेरंग’ का निर्माण राहुल्स ग्राफिक्स ने किया है और इसका समर्थन फ्लीटगार्ड फिल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किया गया है।

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उठो, जागो

स्वामी विवेकानंद जयंती पर प्रस्तुत यह कविता युवाओं को निडर बनने, लक्ष्य के प्रति सजग रहने और अपने भीतर ईश्वर को पहचानने का संदेश देती है। सेवा, त्याग और मानवता के माध्यम से सशक्त भारत के निर्माण की प्रेरणा इसमें निहित है।

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“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.

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बाप रे बाप

यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।

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A lone Indian devotee performing dandavat parikrama on a forest path under full moonlight near Giriraj Hill, surrounded by calm nature, reflecting devotion, surrender, divine protection, and spiritual peace.

प्रेम, परिक्रमा और प्रसाद : जंगल में प्रभु की लीला

गिरिराज जी की दंडवती परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, बल्कि समर्पण और कृपा का साक्षात अनुभव है। एकाकी पथिकों से भेंट, अस्वस्थता में प्रभु की सहायता, अजनबी हाथों से मिला प्रसाद, जंगल में जल-अन्न और रात्रि की पूर्णिमा में गिरिराज का सान्निध्य हर क्षण यह अनुभूति देता है कि जहाँ विश्वास है, वहाँ प्रभु स्वयं मार्गदर्शक बन जाते हैं।

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अशुद्ध जल सप्लाई : एसडीएम ने मामला किया खारिज

नगर पालिका परिषद नागदा द्वारा शहर को लगातार आठ दिनों तक मटमैला, मिट्टीयुक्त और अशुद्ध जल सप्लाई किए जाने की स्वयं की लिखित स्वीकारोक्ति सामने आने के बाद भी एसडीएम द्वारा प्रकरण को आंशिक आपत्ति स्वीकार कर खारिज कर देना पूरे शहर में गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. आवेदक अभय चोपड़ा ने इस निर्णय को सत्ताधारी दल के दबाव में लिया गया बताते हुए कहा कि यह सीधे-सीधे जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 151 से 164 के अंतर्गत दंडनीय अपराध बनता है.

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जिसके सिर पर छांव नहीं थी… वो खुद सूरज बन गया”

फादर्स डे पर बच्चों ने मुझे बधाई दी, लेकिन मैं अपने पिता को कभी ‘हैप्पी फादर्स डे’ नहीं कह पाया। क्योंकि वो होते हुए भी कभी पिता जैसे नहीं रहे। ठोकरें लगीं, खुद ही संभला, खुद ही सीखा… शायद इसी में ज़िंदगी की असली सीख थी।”

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