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ऑनलाइन दोस्ती सच या भ्रम

स्क्रीन के उस पार भी बनते हैं मजबूत रिश्ते

आज के डिजिटल दौर में दोस्ती का मतलब सिर्फ आमने-सामने मिलना नहीं रह गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Instagram, Discord और WhatsApp ने रिश्तों की परिभाषा ही बदल दी है। खासकर COVID-19 lockdown के दौरान, लाखों लोगों ने ऑनलाइन दोस्त बनाए. ऐसे दोस्त जो कभी मिले नहीं, लेकिन दिल के बहुत करीब आ गए।

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अकेले बैठे भावुक पुरुष के चेहरे पर छिपे दर्द को दर्शाती यथार्थवादी तस्वीर

पुरुष ! तुम्हें रोना नहीं

पुरुष भी रोता है, लेकिन समाज उसे रोने की अनुमति नहीं देता. माँ की छाया से लेकर जीवन के संघर्षों तक, वह अपनी पीड़ा को भीतर छिपाकर जीता रहता है.

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खंडहर महल

कभी ये महल रोशनी और रौनक से भरे रहते थे। उनकी दीवारों पर तस्वीरें मुस्कुराती थीं और झरोखों से सपनों की हवाएँ बहती थीं। लेकिन आज वही महल खामोश और वीरान खड़े हैं। उनकी दरारों में घास उग आई है और सन्नाटा इतना गहरा है कि बस हवा की गूंज सुनाई देती है, जैसे वक्त सब कुछ चुपचाप चुरा ले गया हो। जहाँ कभी कदमों की आहट और राग–रंग की महफ़िलें सजती थीं, वहाँ अब धूल और पत्थरों की चादर बिछी है। ये खंडहर सिर्फ टूटे पत्थर नहीं, बल्कि समय के साक्षी हैं, जो बताते हैं कि वैभव मिट जाता है, पर इतिहास हमेशा जीवित रहता है।

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अरावली केस : सुप्रीम कोर्ट की अपने ही आदेश पर रोक

अरावली पर्वतमाला से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को जारी अपने ही आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी और तब तक किसी भी तरह की खनन गतिविधि नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार और अरावली क्षेत्र से जुड़े चार राज्यों राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्लीसे इस मामले में जवाब तलब किया है।

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विश्व पुस्तक मेले में उज्जैन की गूंज: ‘व्यंग्य के रंग’ में शामिल डॉ. हरीशकुमार सिंह

राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘व्यंग्य के रंग’ में उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह की रचना का चयन शहर के लिए गौरव का विषय बना।

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श्वेत वस्त्र धारण किए जपमाला और कमंडल के साथ माँ ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप

हे माँ ब्रह्मचारिणी

नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना और उनकी कठोर तपस्या को समर्पित यह भक्तिमय कविता श्रद्धा, संकल्प और समर्पण का संदेश देती है। पढ़िए माँ के दिव्य स्वरूप और महिमा का काव्यात्मक गुणगान।

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प्रोफेसर अजहर हाशमी नहीं रहे

“हर विषय और हर शख्सियत पर जब वे लिखते हैं, तो पढ़ने वाला पढ़ता ही रह जाता है।”
यह पंक्ति प्रोफेसर हाशमी की अद्भुत लेखनी और ज्ञान की गहराई को दर्शाती है, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

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विदा के उस मोड़ पर खड़ी यादें

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद बादलों के पार एक जहान और भी है,यादों के दरमियान जो नहीं है, वह भी है.31 दिसंबर 2022 नानी नहीं रही यह मैसेज देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए. आँखों में आँसू आए और जम गए. होंठ फड़फड़ाए और खामोश हो गए. हालाँकि जानती थी, समझ भी रही थी, फिर…

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अजब-गजब के रिश्ते

मैंने कई रिश्तों से गुज़रते हुए बहुत कुछ देखा है। मैंने उन लोगों को देखा जो दिल और जान से मरने वाले थे, पर उनके ही सीने में खंजर उतरते थे। जो लोग महफ़िलों में सीना चौड़ा करके सामने आते थे, उन्हें पीठ में वार करते देखा है। रात भर चादर की सिलवटों को और सुबह उसी चादर को सीधा होते भी देखा है। मैंने उन लोगों को भी देखा जो ताउम्र जख्म देते रहे, और फिर उनके कंधों पर सिर रखकर रोते थे। जिंदगी में बहारों का मौसम लेकर आने वाले लोगों को अक्सर ऐसे लोगों को विरानियों में बदलते हुए देखा है।

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भीड़भरी भारतीय सिटी बस में एक कॉलेज लड़की गर्भवती मजदूर महिला को सीट पर बैठा रही है, जबकि अन्य यात्री शर्मिंदा नजर आ रहे हैं।

शर्मिंदा

“शर्मिंदा” एक मार्मिक हिंदी लघुकथा है, जो समाज की संवेदनहीनता और दिखावटी व्यवहार पर गहरा प्रहार करती है। बस में खड़ी एक गर्भवती मजदूर महिला को कोई सीट नहीं देता, लेकिन कुछ युवाओं का व्यवहार कॉलेज लड़कियों के आते ही बदल जाता है। तभी एक समझदार लड़की इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए महिला को सीट पर बैठा देती है। यह छोटी-सी घटना बड़े सामाजिक संदेश के साथ सामने आती है। कहानी बताती है कि सम्मान रूप देखकर नहीं, जरूरत देखकर देना चाहिए। यह लघुकथा पाठकों को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है।

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