हिंदी हमारी भाषा

हिंदी हमारी मातृभाषा है, सहज अभिव्यक्ति और समृद्ध शब्दों वाली, जिसका आधार संस्कृत में है। यह भाषा भारतीयों के लिए भाव, सौंदर्य और संस्कृति का प्रतीक है। हिंदी हमें अनुभूतियों, छंद, अलंकार और दोहों के माध्यम से जोड़ती है। यह माँ के आँचल जैसी शीतलता देती है, और जनमानस में गंगा की तरह पावन तरंगें फैलाती है। हिंदी साहित्य का उपवन हमेशा सुवासित और पल्लवित रहे, यही हमारी कामना है।

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महेश शुक्ला: दोस्ती, डांट और प्यार का अनोखा सफर

पुणे की मंडली आज भी कर रही इंतजार अकोला में बैठे हैं अपने ‘डॉन’ महेश शुक्ला

आप मुझे ढूंढ रहे हो और मैं आपका यहां इंतजार कर रहा हूं..ये दोनों डायलॉग अमिताभ बच्चन की फिल्मों में एक में उनका इंतजार हो रहा है दूसरे में वो किसी का इंतजार कर रहे हैं. एकदम कंट्रास्ट. एक दम उलट. वैसे ही हमारे अग्रज, हमारे सहयोगी, हमारे आशीर्वाद दाता महेश शुक्ला भी एकदम कंट्रास्ट है. वे जैसे हैं वैसे दिखते नहीं… जैसे दिखते हैं वैसे हैं नहीं. 60 की उम्र के बाद भी (असली उम्र नहीं बताउंगा) यदि किसी ने उनके प्रति इस बात के लिए सहानुभूति जताई कि वे बुजुर्ग हैं तो भले ही आपको मुंह पर कुछ नहीं कहे लेकिन मन में जरुर कहेंगे बुड्ढा होगा तेरा बाप… क्योंकि इस उम्र में भीशख्सियत हेलमेट लगाकर जब केटीएम जैसी स्पोर्टस बाइक चलाते हैं तो अच्छे-अच्छे युवाओं को पीछे छोड़ देते हैं.

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“साथ होकर भी दूर”

आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.

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Open diary on a wooden desk with yellowed pages and blurred handwritten words, sunlight falling on it, symbolizing confinement, emotional struggle, and the longing for freedom, with a distant view of open sky and flying birds through the window.

डायरी – कुछ कहानियां…

डायरी के पन्नों में कैद होती हैं वे कहानियां, जो जीवन की मजबूरी और अपमान की गवाही देती हैं। खुला आसमान और उन्मुक्त पंछियों की उड़ान उनके लिए सपना बन जाती हैं, परन्तु उनके शब्द अपनी बेबसी और तिरस्कार की कहानी बयाँ करते हैं।

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शिव से हो जाओ तुम..

जो खोना नही चाहते रिश्तों को जहर के घूंट पी के भी, मुस्कुराओ तुम, शिव से हो जाओ तुम.. दो बोल भी मीठे ना मिले किसी रिश्ते में, कोई गम नही, तपती झुलसती बातें भुला के प्यार की बरसात कर जाओ तुम शिव से हो जाओ तुम…. बड़े भी चाहे तुम्हें, बच्चे भी बतियाये, तुमसे…

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कठपुतलियों के माध्यम से प्रेम और एहसासों को दर्शाती भावनात्मक हिंदी कहानी का दृश्य

धागों से परे

कुछ रिश्ते डोरियों से नहीं, आत्मा के एहसासों से बंधे होते हैं। “धागों से परे” एक ऐसी मार्मिक कहानी है, जिसमें कठपुतलियाँ प्रेम, बिछड़न और मुक्ति का प्रतीक बन जाती हैं।

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जीवन के सफर में साथ चलते लोगों और रिश्तों को दर्शाती प्रेरणादायक हिंदी कविता।

जीवन के इस मेले में

जीवन एक मेला है, जहाँ कुछ लोग साथ निभाते हैं, कुछ ठोकरें देते हैं और कुछ हमें मजबूत बनाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। यह कविता जीवन के इन्हीं रंगों और सच्चे रिश्तों का भावपूर्ण चित्रण है।

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river

नदी के आँसू

दी रोती भी है—पर पहाड़ उसकी आँखों के आँसू देख ही कहाँ पाते हैं। वो अपनी ऊँचाई की अकड़ में तने रहते हैं। उन्हें लगता है नदी तो बस बादलों की आवारा सखी है, बहती है, गुज़रती है… बस।

पर हक़ीक़त यह है कि पहाड़ की ऊँचाई को हरियाली, जीवन, शब्दसब कुछ नदी ही देती है। वही उसके अस्तित्व को अर्थ देती है। ऊँचाई अकेली कुछ नहीं होती गहराई चाहिए। और गहराई नदी ही देती है।

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कुछ अनकही …

सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।

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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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