दो रास्तों के बीच खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति, इच्छा और ईश्वर की इच्छा के बीच आंतरिक संघर्ष को दर्शाता आध्यात्मिक दृश्य।

इच्छा और ईश्वर का संघर्ष

इच्छा और ईश्वर का संघर्ष’ एक गहन आध्यात्मिक लेख है, जो मनुष्य की अनंत इच्छाओं, ईश्वर की व्यवस्था और समर्पण के भाव के बीच के सूक्ष्म संबंध को समझाने का प्रयास करता है। यह लेख बताता है कि हर अधूरी इच्छा केवल अभाव नहीं, कई बार जागरण का मार्ग भी होती है।

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झुकी हुई रीढ़ के प्रतीक के रूप में लोकतंत्र, चुनावी रैली, भीड़ और मंच पर खड़े नेता का व्यंग्यात्मक दृश्य

लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़

लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसकी रीढ़ भीड़ और दिखावे के बोझ तले झुकती नजर आती है। चुनावी रैलियाँ संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गई हैं, जहाँ नागरिकों को गिना जाता है, समझा नहीं जाता। जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकार नहीं, बल्कि चुनावी उपहार की तरह परोसी जा रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में मतदाता धीरे-धीरे ग्राहक में बदलता जा रहा है। फिर भी उम्मीद कायम है जब जनता सवाल पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़ फिर से सीधी होने लगती है।

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6.5 फीट ऊंचा अजय राज गेहूं खेत में खड़ा हुआ

7 फीट का सुपर गेहूं आंधी-तूफान भी बेअसर

राजस्थान के किसान विकास कुमार सैनी ने 9 साल की मेहनत से ‘अजय राज’ नामक 6.5 से 7 फीट ऊंची गेहूं की किस्म विकसित की. यह मौसम प्रतिरोधी, पोषण से भरपूर और 40-45 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन देने वाली किस्म है.

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लोहड़ी

“लोहड़ी” लघुकथा में प्रेम, मानवता और त्यौहार का सुंदर संगम है। बहु के प्रेम और समझ से सासू माँ का दिल बदलता है, और पर्व स्नेह का प्रतीक बन जाता है।

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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तुम और मैं : दो छोर, एक डोर

हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।

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एक आत्मविश्वासी युवती सूर्योदय के समय छत पर खड़ी है, उसके पास टूटा हुआ पिंजरा पड़ा है और आसमान में उड़ते पक्षी आज़ादी और सपनों की उड़ान का प्रतीक हैं।

उड़ान

‘उड़ान’ एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है, जो लड़कियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र सोच और सपनों को पंख देने की बात करती है। यह कविता समाज की बंदिशों के विरुद्ध हौसले और विश्वास का संदेश देती है।

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अकेली वृद्ध माँ बैठी हुई, आँखों में आँसू और मन में पीड़ा, सामाजिक उपेक्षा का प्रतीक

क्यों वृद्धाश्रम में जाऊँ

यह कविता उस माँ की पीड़ा को स्वर देती है, जिसने जीवन भर अपनी संतान को सींचा, सँवारा और बड़ा किया, लेकिन अंत में उसी से वृद्धाश्रम जाने का आदेश मिला। यह रचना समाज से एक करुण सवाल पूछती है क्या माँ का अब कोई ठौर नहीं?

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राजस्थान में मौसम बदला, अलवर-सीकर में कोहरा

राजस्थान में मौसम ने फिर करवट ली है। वेस्टर्न डिस्टरबेंस खत्म होने के साथ ही उत्तर-पश्चिमी हवाओं का असर शुरू हो गया है। मंगलवार की रात के न्यूनतम तापमान में गिरावट के कारण ठंड और तेज हो गई। सीकर में मंगलवार को रिकॉर्ड 2 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया।

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एक दिवाली बचपन वाली…

वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।

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