Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
An elderly Indian father caring for his sick wife in a dimly lit room, reflecting loneliness, sacrifice, and the struggles of old age.

पिता की पीड़ा

वर्तमान पिता” एक मार्मिक कविता है, जो उस पिता की कहानी कहती है जिसने अपना पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित कर दिया, लेकिन बुढ़ापे में उपेक्षा, अकेलेपन और स्वार्थपूर्ण रिश्तों का सामना कर रहा है। यह कविता बदलते पारिवारिक मूल्यों और माता-पिता के प्रति संवेदनशील होने का संदेश देती है।

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‘अर्घ्य’ मराठी काव्य संग्रह का विमोचन

मुंबई में संपन्न हुई काव्य गोष्ठी में युवा कवि उमेश चव्हाण के मराठी काव्य संग्रह ‘अर्घ्य’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में प्रमुख साहित्यकारों और कला-संस्कृति के गणमान्य व्यक्तियों ने पुस्तक की प्रशंसा की और कवियों ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।

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चरित्र …

चरित्र की व्याख्या समाज ने हमेशा अपने दृष्टिकोण से की है – पुरुष का चरित्र उस पन्नी जैसा है जो टपकती हुई छत पर बांध दी जाती है। चाहे वह कितनी भी मैली हो जाए, वह दीवारों को सीलन से बचाने का काम करती रहती है – बिना कोई प्रश्न किए, बिना कोई उंगली उठाए, बस चुपचाप अपना दायित्व निभाती है।

औरत का चरित्र उस घर की देहरी है, जिसे चाहे जितना भी अल्पना से सजा लिया जाए, उसे पांव मारकर मटियामेट करने का जन्मसिद्ध अधिकार हर किसी को प्राप्त होता है – घर के अंदर वाले को भी और बाहर वाले को भी।

पुरुषों का चरित्र पुरुषों से सदैव सुरक्षित रहता है। वे आपस में महफिलें सजाते हैं, एक-दूसरे की चुप्पियों का सम्मान करते हैं, और “तेरी भी चुप, मेरी भी चुप” के सिद्धांत पर चलते हुए सहजता से जीवन का आनंद लेते हैं।

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एंटीडाट

हमारे समय की विडंबना यह है कि जो शिक्षा कभी आदर्शों का मंदिर थी, वही अब सौदेबाज़ी के गलियारों में बदलती जा रही है। मेडिकल डिग्री पाने की होड़ में लुटे गए विद्यार्थी, जब डॉक्टर बनकर समाज में उतरते हैं, तो कुछ सच में ईश्वर का रूप बनकर सेवा करते हैं, पर कुछ वही लूट की परंपरा विरासत में लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। बीमारी का इलाज तो मिलता है, पर कई बार इलाज जेब का भी हो जाता है। सेवा और मेवा के बीच की पतली रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है. लालच की इस बीमारी का असली “एंटीडाट” आखिर कहाँ मिलेगा?…….
मधु चौधरी की एक व्यंग्य रचना

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भव्य बंगले में जन्मदिन समारोह के बाद अकेली बैठी एक महिला, जिसके पास उसकी बहू सहानुभूति से बैठी है, रिश्तों और मानवता का भावनात्मक दृश्य।

सुनहरी ज़ंजीरें

मुंबई के पॉश इलाके में समुद्र के किनारे बना “रत्नालय” दूर से किसी महल जैसा दिखाई देता था। ऊँची दीवारें, चमचमाती काँच की खिड़कियाँ, विदेशी गाड़ियाँ और हर समय आने-जाने वाले लोगों की भीड़—ये सब कुछ उस आलीशान घर की हैसियत बयान करती थीं।

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खुली किताब से निकलती रोशनी और भावनाओं का संसार, साहित्य की शक्ति को दर्शाता दृश्य

किताबों की खुशबू

किताबों की खुशबू में एक ऐसा संसार बसता है, जहाँ शब्द नहीं, भावनाएँ बोलती हैं। साहित्य केवल अक्षरों का मेल नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज़ है, जो हर युग में मन को छूती है। यह कभी भक्ति, कभी सत्य, तो कभी प्रेम और जीवन की गहराई बनकर हमारे भीतर उतरता है। अंधेरों में यही एक दीप बनकर राह दिखाता है और उलझनों में उत्तर बनकर सामने आता है। इसलिए किताबों से जुड़ना, दरअसल खुद से जुड़ना है क्योंकि साहित्य ही हमें इंसान बनने का सच्चा अर्थ सिखाता है।

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एक दुआ

यह कविता एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम और आशीर्वाद की अभिव्यक्ति है, जहाँ वह अपने सुख और उम्र तक को त्याग कर संतान के लिए उज्ज्वल, सुरक्षित और छायादार जीवन की कामना करती है।

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हिन्दी से है मेरी पहचान

यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।

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Passengers inside Mumbai Metro Aqua Line 3 underground station checking mobile phones showing no network connectivity.

जमीन के नीचे दौड़ रही ट्रेन, लेकिन ‘डिजिटल अंधेरे’ में

मुंबई की महत्वाकांक्षी अंडरग्राउंड मेट्रो एक्वा लाइन3 को शुरू हुए तीन महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब भी यात्री एक बुनियादी सुविधा से वंचित हैंमोबाइल नेटवर्क. वर्ली से कोलाबा के बीच कई स्टेशन और सुरंगें ऐसी हैं, जहाँ ट्रेन तो निर्बाध दौड़ती है, लेकिन मोबाइल पूरी तरह नो नेटवर्क हो जाता…

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हिंदी लेखिका मौसमी चन्द्रा का चित्र, जिनकी रचनाएँ कविता, कहानी और साहित्य संपादन के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं

मौसमी चंद्रा: एक उर्जावान और संवेदनशील रचनाकार

मौसमी चन्द्रा एक बहुमुखी हिंदी लेखिका और संपादिका हैं, जिनकी रचनाएँ भावनात्मक गहराई और सामाजिक सरोकारों से परिपूर्ण हैं।

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