बेंगलुरु की सड़कों पर “हैप्पी एयर परेड”

बेंगलुरु। 25 जनवरी को बेंगलुरु की सड़कों पर एक अनोखा और दिल को छू लेने वाला दृश्य देखने को मिलेगा। हैप्पी एयर (Happpy AiR) और बेंगलुरु ट्रैफिक पुलिस के सहयोग से पूरे शहर में “हैप्पी एयर परेड” निकाली जा रही है। यह परेड किसी एक रूट तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शहर के व्यस्ततम सार्वजनिक…

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मैं हाउसवाइ़फ बनना चाहती हूँ…

“कृष्णा जानती थी — उसे यही आज़ादी चाहिए थी। अपने बच्चों के लिए… अपने परिवार के लिए… एक हाउसवाइफ़ बनकर वो सबसे आज़ाद और पूर्ण महसूस कर रही थी। यह उसकी पसंद थी, समझौता नहीं।”

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डॉ. सविता सिंह को मिला ‘हिंदी साहित्य सेवी सम्मान’

, हिंदी दिवस के अवसर पर बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना द्वारा आयोजित विशेष समारोह में जमशेदपुर की सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवयित्री डॉ. सविता सिंह ‘मीरा’ को “हिंदी साहित्य सेवी सम्मान” से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ द्वारा प्रदान किया गया।

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सिर्फ तुम चाहिए

यह कविता का अंश मानो एक साधारण पर गहरे भावों वाला संवाद है। कवि यहाँ अपने प्रिय से कह रहा है कि जब मिलने आओ तो अपने **ब्रांडेड शौ जूते, मोजे और चश्मा** उतारकर आना। क्योंकि उसे सिर्फ सादगी में लिपटा “तुम” चाहिए।
उसकी **सूती साड़ी**, जो प्रतीक है उसकी अपनी सहजता और सरल जीवन का, इन चमकते ब्रांड्स के सामने सहम जाती है। वह नहीं चाहती कि मुलाक़ात में बाज़ार के लेबल और दिखावा हावी हों।
असल में संदेश यही है कि रिश्ते का सौंदर्य तब ही खिलता है जब उसमें **सादगी और आत्मीयता** हो, न कि बाहरी आडंबर।

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हिंदी भाषा के सम्मान और राष्ट्रभाषा के गौरव को दर्शाता भारतीय दृश्य

हिंदी का सम्मान करें

हिंदी भाषा के सम्मान और राष्ट्रभाषा के स्वर को सशक्त रूप में प्रस्तुत करती यह कविता भारत की सांस्कृतिक एकता और भाषाई गौरव का संदेश देती है।

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प्रयागराज: जहाँ जल भी मोक्ष का द्वार बनता है

प्रयागराज—तीर्थों का राजा, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम आत्मा को छू लेने वाला अनुभव बन जाता है। यह केवल नदियों का मिलन नहीं, श्रद्धा और सनातन परंपरा की धारा है। संगम में एक डुबकी, जीवन के सभी द्वंद्वों से मुक्ति और शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। नाव की धीमी चाल, मंत्रों की गूंज और जल पर तैरते दीप—यह एक ऐसी यात्रा है, जो हृदय को भीतर तक शांत कर देती है।

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दगडूसेठ गणपति को अर्पित फूलों से प्रतिदिन बनती है ३०० किग्रा खाद

किसानों की जाती है निःशुल्क खाद वितरित श्रीमंत दगडूसेठ गणपति के चरणों में श्रद्धापूर्वक अर्पित फूल, मालाओं और नारियल से बना निर्माल्य अब किसानों के जीवन में खुशियां बिखेर रहा है. पिछले नौ वर्षों से, रोटरी क्लब ऑफ पुणे युवा इस निर्माल्य को एक नया अर्थ दे रहा है. गणेशोत्सव भक्ति, आस्था और उत्साह का…

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उससे मिलना

बहुत समय बाद उससे मिलकर मन को एक अजीब सुकून मिला। मैं उसे याद करता था जब वह बहुत छोटी थी — बिल्कुल गुड़िया जैसी। अब वह शादी-शुदा है, पति और बच्चे हैं, और एक खुशहाल जीवन जी रही है। यह देखकर मेरे चेहरे पर स्वाभाविक हँसी खिल उठी।

इतनी सम्पन्नता के बावजूद उसकी फितरत नहीं बदली है। उसकी सम्मोहक और उन्मुक्त हँसी, अविश्वसनीय सरलता और निहायत शालीनता आज भी बरकरार है। मैं सोचता हूँ कि कैसे वह उन मर्यादाविहीन लोगों से निपटती होगी, जो हमारे बीच निशंक घूमते हैं। ऐसे लोग अपने बीच होने पर यह भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया आज भी सुन्दर है। उनकी मौजूदगी यह अहसास कराती है कि अच्छाई और बुराई की सतत लड़ाई में अंततः कौन जीतेगा, यह सुनिश्चित है।

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महाकाल की भक्ति और सेवा: कावड़ यात्रियों के लिए अन्नक्षेत्र

श्रावण मास में उज्जैन आने वाले कावड़ यात्रियों के लिए श्री महाकालेश्वर मंदिर समिति ने इंदौर रोड स्थित त्रिवेणी शनि मंदिर के पास अस्थायी अन्नक्षेत्र की शुरुआत की है, जहाँ प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन वितरित किया जा रहा है। यह भोजन महाकाल मंदिर के अन्नक्षेत्र में तैयार होकर भगवान को भोग लगाने के बाद यात्रियों तक पहुँचाया जाता है। समिति द्वारा सोमवार को व्रती भक्तों के लिए फलाहारी खिचड़ी और चिप्स की भी विशेष व्यवस्था की गई है। वर्ष 2004 से यह अन्नक्षेत्र परंपरा रूप से संचालित हो रहा है, जो भक्तों के दान से चलती है। विशेष अवसरों पर श्रद्धालु भोजन प्रसादी के लिए मंदिर को दान भी करते हैं। पहले सोमवार को 10 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने अन्नक्षेत्र का लाभ उठाया।

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ऐतिहासिक दीवार

मैं एक पुरानी दीवार हूँ बोलने में असमर्थ, फिर भी सबके दुःख-दर्द, गुस्से और उपेक्षा की साक्षी| लोग अपने विषाद, हँसी, और थकान को मुझ पर टांग जाते हैं जैसे कोई पोस्टर दीवार पर चिपकाता है| जब वे मेरी पीठ से सिर टिकाकर बैठते हैं, मैं उन्हें मौन सहारा देती हूँ्| फिर भी, बदले में मुझे गालियॉं और अपमान मिलता है जैसे कोई पान की पीक थूक देता हो| मैं पुरानी जरूर हूँ, टूटने की कगार पर भी, लेकिन मेरे भीतर इतिहास छिपा है मैं ऐतिहासिक हूँ्

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