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हिंदी दिवस: मातृभाषा की मौन पीड़ा

हिंदी मेरी कविता के भाल की बिंदी है, जिसने हर प्रसंग में मेरा साथ निभाया और सहज-सरल भाषा से मेरे गीतों को ढाल दिया। लेकिन यह पीड़ा भी साथ है कि अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भी हम अंग्रेज़ी के ग़ुलाम बने बैठे हैं। मातृभाषा की दुर्दशा देखकर दिल रो उठता है। हिंदी मस्तक की अट्टालिका से औंधे मुँह गिरती दिखाई देती है और अंतर्मन चीत्कार कर उठता है कि जिस देश को अथाह परिश्रम से आज़ादी मिली, वहाँ हिंदी का तिरस्कार क्यों? यह कैसी विडंबना और कैसी बर्बादी है!

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हरियाणा का गौरव गान

अंजू शर्मा ‘वशिष्ठ’ करनाल, हरियाणा हरियाणा है वीरों की धरती, शौर्य जहाँ की शान,रक्त में बसा पराक्रम, माथे पर अभिमान।मिट्टी यहाँ की महके वीरों के बलिदान से,हर दिल में गूँजे स्वर भारत माँ के गान से। पंडित लख्मीचंद की रागनी गूँजे, बनकर लोक कथाएं,नेकीराम शर्मा की वाणी, सच्चा पाठ सिखाए ।ऐसे वीरों की धरती ये,…

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जो खुद को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना!

विद्या का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह सबसे पहले स्वयं को जानने, समझने और जीवन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को खोजने की प्रक्रिया है। यदि हम स्वयं को और समस्त प्राणी जगत को एक ईश्वर की रचना मानकर देखें तो जीवन की अधिकांश उलझनें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। विद्या वही है जो हमें भीतर से शुद्ध बनाए, आत्मा को जानने का अवसर दे और बाहरी दिखावे के मोह से दूर रखे।

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छोटी दुकान के सामने खड़े सफल व्यापारी योगेंद्र पोरवाल, संघर्ष से सफलता की प्रेरक कहानी

जिंदगी में बदलाव जरूरी है

यह प्रेरक कहानी योगेंद्र पोरवाल की है, जिन्होंने मात्र 16 वर्ष की उम्र में पिता के निधन के बाद जिम्मेदारियाँ संभालीं और छोटी सी दुकान से सफर शुरू किया। समय के साथ बदलाव अपनाते हुए उन्होंने संघर्ष, मेहनत और दूरदर्शिता से 30 वर्षों में सफलता की मजबूत पहचान बनाई।

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बिना मेकअप और बिखरे बालों के साथ मुस्कुराती एक युवती, जो सच्चे प्रेम और स्वाभाविक सुंदरता का प्रतीक है।

अनगढ़

कभी-कभी प्रेम किसी की सजावट में नहीं, उसके बिखरे हुए रूप में दिखाई देता है। यह कहानी उस एहसास की है, जहाँ कोई आपको आपकी असलियत में देखकर भी कहे”अच्छी तो लग रही हो।”

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समय बदला पर मेरी यादों का मेला नहीं

गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।

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अंतर्राष्ट्रीय पेन फेस्टिवल पुणे उद्घाटन समारोह"

पेन, स्याही और शब्दों का महाकुंभ

बचपन से ही पेन और स्याही हर इंसान की जिंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। भावनाएं हों या विचार, जानकारी हो या कल्पना शब्दों के जरिए खुद को अभिव्यक्त करने का माध्यम यही लेखन उपकरण रहे हैं। इसी लेखन संस्कृति का उत्सव मनाने जा रहा है पुणे, जहां 10 और 11 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय पेन फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है।

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किराए की खुशियाँ

कभी-कभी हम ऐसी खुशियों का इंतज़ार करते रहते हैं, जो हमारी ज़िंदगी में किराए की तरह आती हैं. कुछ समय रुकती हैं और फिर चली जाती हैं। हम जानते हैं कि वे स्थायी नहीं हैं, फिर भी दिल उन्हें पाने की उम्मीद करता रहता है। इस रिश्ते में भी यही हुआ। ख़ामोशी हमारी भाषा थी, नज़रें संवाद थीं, और उम्मीद हमारा सहारा। हमने अपनी ओर से सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन साथ नहीं मिला। अब वही इंसान, जिसके साथ एक घर बसाने का सपना था, हर बात पर तकरार करता है, और बेरुख़ी को स्वीकार करता है जैसे ये उसकी नई आदत हो।

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चुप्पी, अविश्वास और यौन उत्पीड़न पर आधारित मार्मिक हिंदी कहानी 'उलझन'

उलझन

‘उलझन’ एक संवेदनशील हिंदी कहानी है, जिसमें एक युवती अपने जीजा की गलत हरकतों का शिकार होती है। चुप्पी और गलतफ़हमी उसे अपराधी बना देती है। यह कहानी बताती है कि हर दिखाई देने वाला सच, वास्तव में सच नहीं होता और समय पर आवाज़ उठाना कितना आवश्यक है।

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सर्दियों की ठंडी सुबह का यथार्थ दृश्य, हल्की धुंध से ढकी भारतीय गली, शॉल और ऊनी कपड़ों में लिपटे लोग, आग के पास हाथ सेंकते बुजुर्ग, चाय के कप लिए महिलाएं और जैकेट पहने बच्चे.

सर्दी का मौसम

ठंडी हवा ने जैसे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. सुबह की धुंध गलियों में चुपचाप उतर आई थी और सूरज की किरणें मानो रास्ता तलाश रही थीं. लोग शॉल और स्वेटर में सिमटे, कदम धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे. हर मोड़ पर चाय की भाप उठती दिखती थी, जो ठिठुरते बदन को थोड़ी राहत देती थी. कहीं बुजुर्ग आग के पास हाथ सेंकते नजर आते, तो कहीं बच्चे ठंड से सिकुड़ते हुए भी स्कूल की राह पकड़ते थे. यह सर्दी केवल मौसम नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चाल को थाम लेने वाली एक खामोश ताकत बन चुकी थी.

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