भागती जिंदगी और खालीपन को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य, जिसमें समय की कमी, धन की दौड़ और सुकून से दूर होता आधुनिक मनुष्य दिखाई देता है

खाली हाथ जाना है…

यह कविता आधुनिक जीवन की भागदौड़, दौलत की अंधी दौड़ और सुकून से दूर होते इंसान की विडंबना को उजागर करती है। “मेरी-मेरी” में उलझे मनुष्य की मानसिकता और खोते मानवीय संबंधों पर यह एक गहरी, आत्ममंथन कराती हुई टिप्पणी है।

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कविता और किताब को प्रेम के प्रतीक के रूप में दर्शाता भावनात्मक दृश्य, जिसमें शब्दों के माध्यम से स्नेह और आत्मीयता का एहसास झलकता है

उपहार में शब्द

यह कविता उपहारों से परे शब्दों के स्नेह को महत्व देती है, जहाँ प्रेम फूलों या वस्तुओं में नहीं, बल्कि लिखी और पढ़ी गई कविताओं तथा किताबों के भावनात्मक स्पर्श में बसता है।

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मुलुंड पश्चिम के प्लेयस मैराथन मैक्सिमा सभागार में आयोजित पोइसी टेल्स समूह की वार्षिक बहुभाषी काव्य गोष्ठी में मंच पर काव्य पाठ करते रचनाकार और श्रोताओं से भरा सभागार

शब्दों का उत्सव बना पोइसी टेल्स की बहुभाषी काव्य गोष्ठी

पोइसी टेल्स समूह द्वारा ११ जनवरी २०२६ को मुंबई के मुलुंड पश्चिम में आयोजित वार्षिक बहुभाषी काव्य गोष्ठी में देशभर से आए रचनाकारों ने हिंदी, मराठी और अंग्रेजी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। नन्ही कवयित्री राम्या तिवारी की भावपूर्ण प्रस्तुति कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रही।

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एक भारतीय माँ सुबह के धुंधलके में घर के दरवाज़े पर खड़ी, दूर जाते बेटे को स्नेह और उम्मीद भरी आँखों से देखते हुए.

तुम सपने ज़रूर देखना…

यह कविता सपनों के माध्यम से माँ और संतान के रिश्ते की उस गहराई को छूती है, जहाँ प्रेम स्वार्थ नहीं बल्कि त्याग बन जाता है. महानगर की चकाचौंध के बीच यह रचना याद दिलाती है कि असली ऊर्जा माँ की आँखों में छुपी होती है, और सपनों का सच होना तभी सार्थक है जब उसमें उसकी साँसें बाकी रहें.

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

बाई, आज तू होती तो…

बाई की वह मुद्रा कभी अचानक नहीं होती थी. पूरा महीना इंतज़ार करने के बाद, जब मैं पुणे से अपने घर लौटता, तो माँ हमारे पहले मकान के पहले कमरे में खिड़की खोलकर बैठी होती थी. कहने को तो वह दूध लेने वाले का इंतज़ार कर रही होती थी, पर असल में उसे मेरा ही इंतज़ार होता था. जैसे ही मैं दरवाज़े से भीतर कदम रखता, वह हल्की-सी मुस्कान के साथ एक ही नज़र में मेरा पूरा एक्स-रे कर लेती.. दुबला तो नहीं हुआ, काला तो नहीं हो गयाए बाल और स़फेद हुए या डाई नहीं की. कुछ भी उससे छुपा नहीं रहता था.

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मोबाइल की लत में डूबा समाज दर्शाती हिंदी कविता “मोबाइल की दुनिया”

मोबाइल की दुनिया

मोबाइल आज ज्ञान, संचार और सुविधा का माध्यम है, लेकिन अंधाधुंध उपयोग ने रिश्तों, बचपन और मूल्यों को संकट में डाल दिया है। चन्द्रवती दीक्षित की यह कविता तकनीक और विवेक के बीच
संतुलन की ज़रूरत को गहराई से उजागर करती है।

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विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान 2026 से सम्मानित होने वाले ग़ज़लकार डॉ. प्रमोद कुमार कुश तन्हा

डॉ. प्रमोद कुमार कुश को विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान

सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार डॉ. प्रमोद कुमार कुश ‘तन्हा’ को उनके ग़ज़ल-संग्रह ‘लकीरों का सफ़र’ के लिए 2026 का विद्योत्तमा साहित्य सुधाकर सम्मान नासिक में भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा।

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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सौ सुनार की, एक लोहार की !

जब समाज सवाल करता है, तब एक माँ का विश्वास ही बेटी की सबसे बड़ी ताकत बनता है। तानों और वर्जनाओं के बीच पली उम्मीदें जब मुकाम तक पहुँचती हैं, तो हर बंद उँगली अपने आप हट जाती है और सपने इतिहास बन जाते हैं।

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Softly lit close-up of two Indian hands gently reaching toward each other without touching, expressing emotional connection, trust, and respectful intimacy in a calm, warm-toned setting.

स्पर्श : संवेदना का संगीत

कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।

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