नलखेड़ा का जागृत धाम

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी कौशल बंसल की मां बगलामुखी साधना यात्रा

आस्था, साधना और चमत्कार के अद्भुत संगम का प्रतीक बन चुका मां बगलामुखी मंदिर आज लाखों श्रद्धालुओं की भक्ति का केंद्र है। इस जागृत धाम के पुनरुत्थान और प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई है पूर्व प्रशासनिक अधिकारी कौशल बंसल ने। मां बगलामुखी की कृपा से उन्होंने न केवल अपने जीवन की कठिनाइयों से पार पाया, बल्कि हजारों श्रद्धालुओं को भी दिव्य साधना का मार्ग दिखाया।

अध्यात्म की ओर पहला कदम

कौशल बंसल को आध्यात्मिक जीवन की पहली प्रेरणा 1975 में हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम के गुरु श्री श्यामानंद जी से मिली। इसके पश्चात उज्जैन के गुरुदेव राघवानंद जी से उन्हें सूक्ष्म साधना और गुप्त अध्यात्म की दिशा प्राप्त हुई। गुरुओं के आशीर्वाद से वे नायब तहसीलदार पद पर नियुक्त हुए।

कठिन समय में मां की कृपा बनी रक्षा कवच

नौकरी के प्रारंभिक दिनों में अधिकारियों से मतभेद के कारण उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस समय उनके बहनोई स्व. डॉ. बी.एल. अग्रवाल ने उन्हें मां बगलामुखी का 36 वर्णों का मंत्र दिया। हनुमान जी के बजरंग बाण के साथ उन्होंने मां की साधना प्रारंभ की, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी।

1987 में शुजालपुर से उनका नलखेड़ा स्थानांतरण विवादों के बीच हुआ। वे वहां नहीं जाना चाहते थे, पर पिताजी के आदेश ने रास्ता दिखाया – “तू मां बगलामुखी का भक्त है, तेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” इसी आशीर्वाद के साथ 1 जनवरी 1988 को उन्होंने नलखेड़ा में कार्यभार ग्रहण किया।

मां के मंदिर को दिलाई पहचान

नलखेड़ा में मित्र पुलिस इंस्पेक्टर विजय सिंह पवार ने उन्हें बताया कि यहां द्वापर युगीन मां बगलामुखी का प्राचीन मंदिर है, जिसे लोग ‘बगावद देवी मंदिर’ के नाम से जानते थे। मंदिर उपेक्षित अवस्था में था। बंसल जी ने मां के आदेश पर इसका नाम बदलकर ‘सर्वसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर’ रखा और फोटो व प्रचार के माध्यम से इसे जनमानस से जोड़ा।

सन् 1988 में अपने पिता की स्मृति में सिंहद्वार का निर्माण करवाया गया। मां की कृपा से मंदिर का जीर्णोद्धार प्रारंभ हुआ और जागृति की प्रक्रिया तेज हुई।

मां के स्वप्न से मिला जीवन का मोड़

एक रात मां ने स्वप्न में पूछा – “तू क्या चाहता है?” बंसल जी ने विनती की कि उनका ट्रांसफर इंदौर करवा दिया जाए। ठीक 15 दिन बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश आया और उनका स्थानांतरण इंदौर हुआ, जहां वे 2012 तक सेवा में रहे।

इस अवधि में उन्होंने दो लाख से अधिक मां बगलामुखी के चित्र श्रद्धालुओं में वितरित किए और जनजन को साधना से जोड़ा।

गहन साधना और आध्यात्मिक विस्तार

1992 में सिंहस्थ के दौरान संत बाबा गोपेश्वर गुरु जी से भेंट हुई, जिन्होंने उन्हें श्मशान साधना और तांत्रिक रहस्यों से परिचित कराया। बंसल जी ने उन्हें नलखेड़ा आमंत्रित कर 15 दिन का यज्ञ-हवन करवाया, जिसमें उनके मित्र सीए अजय जैन ने सहयोग किया। इसके बाद मंदिर पूर्ण रूप से जागृत माना गया।

इसके बाद हनुमान जी, मां बगलामुखी की साधना के साथ-साथ उन्होंने हस्तरेखा, अंक विज्ञान, मंत्र, तंत्र, यंत्र और सहज साधना में महारत प्राप्त की। मां की कृपा से उन्होंने 25 से अधिक आध्यात्मिक पुस्तकों की रचना की और सहज यंत्रों का निर्माण करवाया, जिससे लाखों लोग लाभान्वित हो रहे हैं।

धार्मिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान

कौशल बंसल ने कई प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें प्रमुख हैं:

  • श्री पातालगामी उल्टे हनुमान मंदिर, सांवेर (इंदौर)
  • बिल्बामृतेश्वर महादेव, धमपुरी (धार)
  • श्री रणजीत हनुमान मंदिर, इंदौर
  • श्री खजराना गणेश मंदिर, इंदौर

वर्तमान में वे सतयुगीन कुमारिका वन पहाड़ी (इंदौर) में स्थित 18 दिव्य माताओं के स्थल और पाप हरेश्वर महादेव महाकाल पीठ के पुनर्निर्माण कार्य में सक्रिय हैं, जिसमें पूज्य गुरु कैलाश शर्मा जी और परम भक्त शैलेन्द्र पटेल सहित कई भक्तों का योगदान है।

आस्था की मिशाल बने कौशल बंसल

कौशल बंसल का जीवन एक साधक का नहीं, बल्कि आस्था, सेवा और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन गया है। मां बगलामुखी की कृपा से उन्होंने जो अनुभव और कार्य किए हैं, वे आने वाली पीढ़ियों को भी मार्गदर्शन देते रहेंगे।

कीर्ति राणा, वरिष्ठ पत्रकार एवं कॉलमिस्ट

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