क्या इंसानों के पास है सेवन्थ सेंस

-विज्ञान की सबसे कूल खोज, जो स्पर्श को नया अर्थ देती है सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज अब तक हम सिर्फ सिक्स्थ सेंस के बारे में ही जानते थे जो अदृश्य रूप से हमें संभावित घटना के बारे में आगाह कर देती थी.. आप सिक्स्थ सेंस से कुछ ऐसा महसूस कर सकते थे जो…

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नई शुरुआत

यह कविता हमें याद दिलाती है कि पराजय को भूलकर स्वयं पर विश्वास करना और पुनः शुरुआत करना आवश्यक है। आने वाला कल बेहतर होगा, और प्रसन्नता, धैर्य, हौसला और सतत प्रयास हमें निराशा से आगे बढ़ने में मदद करेंगे। अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करके, अच्छे कर्म करते हुए हम सफलता और खुशियों की राह प्रशस्त कर सकते हैं।

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भक्ति और श्रद्धा के सागर में डूबा नगर

नगर में आध्यात्मिक उल्लास और भक्ति की अनुपम छटा देखने को मिली, जब श्रीराम हनुमान मंदिर सेवा समिति के तत्वाधान में श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ. बैंड-बाजों की मधुर धुन, ढोल-नगाड़ों की थाप और हरिनाम के जयघोष से पूरा नगर भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो गया. सैकड़ों श्रद्धालुओं की सहभागिता, पुष्पवर्षा और श्रद्धा भाव ने इस पावन आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया. पं. सुनीलकृष्ण व्यास के ओजस्वी प्रवचनों ने कथा के प्रथम दिवस को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया, जिससे नगरवासियों में शांति, भक्ति और आनंद का संचार हुआ.

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पर्णकुटी और कोंगा सॉफ्टवेयर द्वारा महिलाओं को मिला स्वरोजगार

पर्णकुटी संस्था और कोंगा सॉफ्टवेयर प्रा. लि. की ओर से जरूरतमंद महिलाओं को स्वरोजगार के लिए आर्थिक सहयोग और सामग्री प्रदान की गई। इस उपक्रम के तहत कुल 10 महिलाओं को बिजनेस किट्स दी गईं। इनमें से तीन महिलाओं को सिलाई मशीनें, चार महिलाओं को एडवांस ब्यूटी पार्लर किट्स और तीन महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए कुल 32,500 रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की गई। यह कार्यक्रम सामाजिक दायित्व (CSR) के अंतर्गत स्वयंरोजगार और कौशल विकास अभियान** के रूप में आयोजित किया गया। इस अवसर पर अभिनेत्री तथा *अस्मिता महाराष्ट्राची* संस्था की संचालिका अंकिता शिवतारे और पर्णकुटी की सह-संस्थापक स्नेहा भारती मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। उनके हाथों लाभार्थी महिलाओं को स्वरोजगार सामग्री वितरित की गई।

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नेशनल बुक रीड डे : किताबों के साथ एक दिन

आज का नेशनल बुक रीड डे केवल एक तारीख नहीं, बल्कि किताबों के साथ समय बिताने, उन्हें पढ़ने और उनकी संगति का आनंद लेने का अवसर है। पढ़ना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है—यह तनाव कम करता है, याददाश्त और एकाग्रता बढ़ाता है, और कल्पनाओं को उड़ान देता है। किताबें हमें इतिहास से जोड़ती हैं, सोच बदलती हैं, और जीवन को नई दिशा देती हैं। चाहे बच्चों को पढ़कर सुनाएँ, दोस्त या परिवार के साथ साझा करें, या अकेले अपने कोने में बैठकर पढ़ें—किताबों का असली आनंद अनुभव और आत्मा से जुड़ने में है।

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मुआवज़ा

गंगा घाटी की बाढ़ ने न जाने कितने घर उजाड़ दिए। लोचू के पिता भी उसी बाढ़ में लापता हो गए। तीन दिनों से परिवार उनकी खोज में भटक रहा था। घर में मातम था, पर जब टीवी पर “मुआवज़े” की खबर चली — 94 लाख रुपए का — तो लोचू की प्रार्थना बदल गई। अब उसके भगवान से माँग पिता की सलामती नहीं, बल्कि मुआवज़े की रकम की थी।

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पुराने लकड़ी के संदूक में रखी बचपन की यादें, माँ की साड़ियाँ और भावनात्मक माहौल

एक नायाब संदूक

“एक नायाब संदूक” केवल एक कविता नहीं, बल्कि स्मृतियों का ऐसा कोमल संसार है, जहाँ बचपन की शरारतें, यौवन के सपने और माँ का स्नेह एक साथ सिमट आते हैं। इस कविता में संदूक एक प्रतीक बनकर उभरता है वह स्थान जहाँ जीवन के सबसे अनमोल क्षण सुरक्षित रहते हैं।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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गीता उठा

क्यों रंगहीन हो जीवन तेरा, देखोयह बनफूल फिर से महक उठा। पियुष पी कर हो रहे जो उन्मत्त तब,विषधर की कल्पना से मैं जी उठा। रजत-कंचन ही है, चमकते सोच मत,आग में यूँ ती नहीं, वो जल उठा। अधर्म की जब-जब हो विजय,कर सामना तू धर्म का, धनुष उठा। क्यों दीन-हीन यूँ बन बैठे हो,जरा…

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विदा के उस मोड़ पर खड़ी यादें

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद बादलों के पार एक जहान और भी है,यादों के दरमियान जो नहीं है, वह भी है.31 दिसंबर 2022 नानी नहीं रही यह मैसेज देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए. आँखों में आँसू आए और जम गए. होंठ फड़फड़ाए और खामोश हो गए. हालाँकि जानती थी, समझ भी रही थी, फिर…

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