भंँवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कुंँवर….

मेरे जीवन की वाड़ी, जिसे मैंने प्रेम और समर्पण से सींचा, फूलों-सी महकी और पत्तों-सी निखरी। भौंरे उसकी मिठास में आकर्षित होकर अपने हिस्से का रस ले गए। मैंने जिन लोगों को अपना मानकर आगे बढ़ने का हिस्सा बनाया, उनका साथ भी किसी उद्देश्य से था—पर वे सगे नहीं थे, और समय ने उनके असली चेहरे दिखा दिए। उनकी ज़रूरतें और इच्छाएँ अधिक थीं, और जब तक मैं काम आता, वही काफी था। फिर भी, हौसलों को बुलंद रखकर, नेक काम करके, आगे बढ़ जाना ही सही राह है।

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मुकेश “कबीर” को मिला राष्ट्रीय कलम गौरव सम्मान

देश के सुप्रसिद्ध गीतकार और व्यंग्यकार मुकेश “कबीर” को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ, प्रयागराज द्वारा राष्ट्रीय कलम गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया।

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विषाद

महेश चार साल बाद घर लौटा था. सिर्फ राखी के लिए, और शायद इसलिए भी कि ज़िंदगी उसे एक मोड़ पर ले आई थी। उसके साथ थी भवानी एक आत्मविश्वासी, पढ़ी-लिखी और दृढ़ स्वभाव वाली स्त्री, जिसने घर की दहलीज़ पर कदम रखते ही सभी पुराने समीकरण बदल दिए। पिता की कटु टिप्पणियाँ, चाचा की चालें, और परिवार का दोगलापन सब उसकी शांत मुस्कान और सधे हुए शब्दों के आगे फीके पड़ने लगे। बहनें, जिनके लिए महेश ने जीवन खपा दिया, पहली बार किसी बाहरी से अपार स्नेह महसूस कर रही थीं। तीन दिनों ने वर्षों पुरानी दूरी को उधेड़कर रख दिया

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मैदान से महाकाल तक…

गरिमामय एवं आत्मीय समारोह में 4 दशक से मैदानी पत्रकारिता के पर्याय बने वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की प्रथम कृति ‘किस्से कलमगिरी के’ का लोकार्पण जाल सभागृह में आयोजित हुआ। समारोह के अतिथि जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजय शंकर मेहता, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता महा विद्यालय भोपाल के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी थे। अध्यक्षता राष्ट्र कवि संचालक सत्यनारायण सत्तन ने की। 

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10 रुपये की कीमत

आज़ादी के बाद के दिनों में दो घनिष्ठ मित्र थे .एक धनी, एक साधारण।
एक दिन निर्धन मित्र ने 10 रुपये उधार लिए और फिर अचानक परिवार सहित कहीं चला गया।
25 साल बाद लखनऊ के एक होटल में दोनों अचानक मिले वही साधारण मित्र अब होटल मालिक बन चुका था।उसने कहा “मैं वो 10 रुपये वापस नहीं दूँगा, क्योंकि उन्हीं 10 रुपयों ने मुझे आज ये पहचान दी है।”

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गुरु की शरण सौभाग्य का द्वार – पं. राजरक्षितविजयजी

श्री संभवनाथ जिनालय, पुणे में आयोजित गुरु पूर्णिमा प्रवचन में पं. राजरक्षितविजयजी ने कहा – “संपत्ति भाग्य से मिलती है, लेकिन सद्गुरु सौभाग्य से मिलते हैं।” उन्होंने गुरु की सेवा को भगवान की सेवा से भी श्रेष्ठ बताया और जीवन में सद्गुरु के मार्गदर्शन की अनिवार्यता पर बल दिया।

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रात के समय खिड़की के पास बैठा एक लेखक, कोरे काग़ज़ पर कलम से भावनाएँ लिखता हुआ

एहसासों का लावा…

लेखक केवल शब्द नहीं लिखता, वह अपने भीतर उमड़ते भावों को स्याही में घोलकर काग़ज़ पर उतारता है। कलम उसकी भावनाओं का वाहक बनती है और कोरा काग़ज़ अहसासों का सजीव संसार। यही लेखन श्रोताओं के दिल तक पहुँचकर अपनी अमिट छाप छोड़ देता है।

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नव अंकुर की आस

नवपल्लवित पौधा अपनी कोमल जड़ों से धरती का आशीर्वाद लेकर जीवन की नई शुरुआत करता है। वह नव अंबर और नव भोर के साक्षी के रूप में जन्म लेता है, अपने भीतर जीवन की नयी आस संजोए हुए। चारों ओर फैले उपवन की मधुर सुवास उसे उल्लास से भर देती है। वह अभी शिशु है, पर हर दिन वायु और जल का स्पर्श पाकर बढ़ने की आकांक्षा रखता है।

वह जानता है कि एक दिन वह विशाल वृक्ष बनेगा—जिसकी छाया में संसार विश्राम करेगा, जो अनगिनत जीवों को ऑक्सीजन और जीवनदान देगा। उसका अस्तित्व निःस्वार्थ है, उसका हर अंश किसी न किसी के काम आने वाला है

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बिहार में 100 विश्वविद्यालय खोलने की पहल

बिहार में शिक्षा की दिशा और दशा सुधारने के लिए शिक्षाविद्? और साहित्यकार ई. अंशु सिंह ने एक अनूठी पहल की है. शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्होंने बिहार में 100 विश्वविद्यालय खोलने के लक्ष्य के साथ राज्यव्यापी भिक्षाटन अभियान की शुरुआत की. इस अभियान का उद्देश्य उच्च शिक्षा के विकल्प बढ़ाना और युवाओं को बिहार से बाहर पढ़ने की विवशता से मुक्त करना है. अभियान की शुरुआत भागलपुर में हुई, जहाँ बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, प्राध्यापक और समाजसेवी उपस्थित रहे. इस अवसर पर ई. अंशु सिंह ने कहा कि यह केवल विश्वविद्यालय (university) खोलने की पहल नहीं है, बल्कि शिक्षा के लिए एक जन आंदोलन की शुरुआत है.

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फर्ग्युसन रोड : पुणे की धड़कन पर एक दिन

णे शहर की रगों में सिर्फ इतिहास नहीं, आज की धड़कन भी बहती है और उस धड़कन की सबसे तेज़ लय सुनाई देती है फर्ग्युसन रोड पर। यहां की सड़कों पर चलती जवान होती नई पीढ़ी, अपने सपनों के स्केच बनाते कलाकार, नए फैशन की तलाश में भटकती युवतियां, और हर नुक्कड़ पर सजे खाने-पीने के ठिकाने .सब मिलकर एक ऐसा जीवंत कोलाज रचते हैं, जिसे देखना नहीं, जीना पड़ता है। चाहे वह ‘कट्टा’ पर बैठे युवाओं की हलचल हो, या ब्रश और कैनवास के बीच गहराते रंग, हर पल कुछ नया, कुछ असाधारण घट रहा होता है। यही पुणे है. जहां हर मोड़ पर ज़िंदगी मुस्कुरा रही होती है, और हर सड़क पर एक नई कहानी जन्म लेती है।कभी-कभी शहर के किसी एक रास्ते पर चलने भर से आप उस शहर की आत्मा से मिल लेते हैं। पुणे में फर्ग्युसन रोड (एफसी रोड) एक ऐसा ही रास्ता है .जो केवल एक सड़क नहीं, एक एहसास है।

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