रावण बहुतेरे

आज रावण के पुतले भले ही जलाए जाएँ, लेकिन वास्तविक रावण अब दस सिर वाले नहीं हैं। वे एक सिर वाले हैं और समाज में असंख्य रूपों में मौजूद हैं। जहाँ बाहर श्याम वस्त्रों में रावण का प्रतीक जलता है, वहीं श्वेत वस्त्रों में छुपे अनेक रावण रोज़ हमारे बीच घूमते हैं। यह रावण अब केवल सीता-हरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हर दिन न जाने कितनी सीताओं का अपहरण और चीर-हरण होता है। मासूमियत की नीलामी होती है और हवस की भट्टी में उसका भस्म किया जाता है। असली चुनौती इन सफेदपोश रावणों का दहन करने की है। सच्चा विजयदशमी तभी होगी जब इनका सर्वनाश किया जाए।

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ग्वालियर में गालव म्यूजिकल ग्रुप की सुरमई शाम

गालव म्यूजिकल ग्रुप द्वारा आयोजित सुरमई शाम का कार्यक्रम इस माह भी बाल भवन में बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुआ। हर बार की तरह इस बार भी कार्यक्रम में आम जनता की पसंद के नगमों की प्रस्तुतियां दी गईं, जिससे श्रोता झूम उठे। कार्यक्रम का संचालन आशी, प्रतिभा दुबे और वर्षा श्रीवास्तव ने किया।

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उज्जैन फिर उज्जयिनी हो जाए

उज्जैन को उज्जयिनी नाम से फिर पहचान दिलाने का प्रयास चल रहा है — एक ऐसी नगरी जो विक्रमादित्य की राजधानी रही, कालिदास और भर्तृहरि की कर्मभूमि रही और जिसे साहित्य, ज्योतिष, संस्कृति और खगोल-विज्ञान की जन्मस्थली माना गया। पंडित सूर्य नारायण व्यास ने विक्रमादित्य की विरासत और उज्जयिनी के गौरव को पुनर्स्थापित करने में महती भूमिका निभाई। आज उज्जैन धार्मिक पर्यटन का केंद्र तो बन गया है, लेकिन उस उज्जयिनी का साहित्यिक, सांस्कृतिक वैभव खोता जा रहा है। अब समय है कि उज्जयिनी को उसका प्राचीन गौरव फिर से मिले — नाम से, संवत् से और सांस्कृतिक पहचान से।

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दो मुंह वाली प्याज़

शुक्रवार की शाम सब्ज़ी मंडी में पहुँची अंजली को आज सिर्फ़ प्याज़ नहीं, ज़िंदगी का गहरा सच दिखा। दुकानदार ने कहा — “मैडम, ये दो मुँह वाली प्याज़ है, इसलिए सस्ती है।”
उस पल अंजली को एहसास हुआ कि इस दुनिया में दो मुँह वाले सिर्फ़ प्याज़ नहीं, इंसान भी हैं — फर्क बस इतना है कि प्याज़ के दो मुँह की गारंटी तो सब्ज़ीवाला देता है, पर आदमियों के दो मुँह और गिरगिट जैसे रंगों की कोई गारंटी नहीं। व्यंग्य और यथार्थ के इस संगम में कहानी आधुनिक स्त्री के भीतर छिपे आक्रोश, व्यथा और आत्मबोध को उजागर करती है।

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बच्चों को खुद चुनने दीजिए उनका सुर

एक पिता ने अपने बेटे को ज़बरदस्ती शास्त्रीय संगीत की कक्षा में भेज दिया, जबकि बच्चे को संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यह लेख बताता है कि कैसे माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोपते हैं और क्यों यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति—चाहे किसी भी उम्र का हो—अपने ही सपनों को पूरा करने का प्रयास करे। बच्चों को उनकी पसंद का रास्ता चुनने देना ही सच्ची परवरिश है।

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ज़िंदगी लेती है नए इम्तिहां

ज़िंदगी हमेशा नए-नए इम्तिहान लेती है। कभी वह मीत बनकर साथ देती है, तो कभी गिला करके दूर चली जाती है। दिल में आने वाले हर दिलकश एहसास का ज़रिया भी वही है। वह कभी हमें प्यार करना सिखाती है, तो कभी अहंकार से टकरा देती है। हर मोड़ पर उसके इम्तिहान अलग होते हैं—कभी तेज़ आँधियों के थपेड़े, तो कभी दर्द से भरा लंबा कारवाँ।

ऐसा मन होता है कि चाँद का एक टुकड़ा और आसमान की एक मुट्ठी पाकर, उन्हें पर्स में छुपा लिया जाए, ताकि कुछ पल सुकून के मिल सकें। उलझनों के बीच भी ज़िंदगी का ही सहारा है, पर उसकी खुशियों की चादर के नीचे दर्द का पाला भी बिछा है। सपनों के परिंदे अब भी उड़ान भरते हैं, मगर छोटे-छोटे ज़ख्म मिलकर एक काफ़िला बन गए हैं। ज़िंदगी ही मेरी साज़ है और मेरी सदा भी। उसी के साथ जीया है और उसी में मैंने अपने भगवान को खोजा है। हर लम्हा नया था, हर दर्द सहा—लेकिन अब दिल चाहता है कि वह थोड़ा ठहर जाए और मेरी हथेली में कुछ हसीं फूल खिला दे।

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भरपेट खाना

हेमा के तीन बच्चे थें।सबसे बडी़ लड़की माया फिर दो लड़के किट्टू और बिट्टू ।हेमा लोगों के घरों में बर्तन मांजने और झाडू पोछे का काम करती थीं ।कहने को पति था , लेकिन न होने के बराबर ।वह एक दूकान पर कपड़े सिलाई का काम करता था। हुनर था हाथों में ।सिलाई अच्छी कर…

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पल्लवी रानी का काव्य संग्रह ‘चितचोर’ विमोचित

मुंबई प्रेस क्लब में आयोजित काव्य संग्रह ‘चितचोर’ के लोकार्पण अवसर पर साहित्यकारों ने कवयित्री पल्लवी रानी की कविताओं को भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा बताया। डॉ. हरि जोशी ने उनकी रचनाओं में दिनकर और दुष्यंत कुमार की प्रतिध्वनि अनुभव करते हुए उन्हें भविष्य की सशक्त काव्य-सम्भावना बताया।

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कल्पकथा साहित्य संस्था द्वारा नागपुर की मेघा अग्रवाल और उनकी पुत्री मिहूं अग्रवाल को कल्प भेंटवार्ता पत्रम से सम्मानित करते हुए

एक मंच, दो पीढ़ियाँ और साहित्य की साझा विरासत

नागपुर की साहित्यकार मेघा अग्रवाल और उनकी पुत्री मिहूं अग्रवाल को कल्पकथा साहित्य संस्था द्वारा एक साथ सम्मानित किया गया। “दो पीढ़ियाँ एक साथ” कार्यक्रम में माँ-पुत्री की यह साहित्यिक यात्रा दर्शकों के लिए प्रेरणा बनी।

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वैलेंटाइन डे जरूरी नहीं, रोज़ के छोटे पल ही बनाते हैं मजबूत रिश्ता

वैलेंटाइन डे जरूरी नहीं, प्यार रोज़ होना चाहिए

महंगे गिफ्ट और सोशल मीडिया दिखावे से हटकर आज के कपल्स प्यार को नए तरीके से जी रहे हैं. माइक्रो रोमांस यानी रोज़मर्रा के छोटे-छोटे पल अब मजबूत रिश्तों की असली पहचान बन रहे हैं. जानिए क्यों सुरक्षित और सच्चे प्यार को वैलेंटाइन डे की जरूरत नहीं होती.

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