होली के अवसर पर रंगों से खेलते लोग, गुलाल और अबीर उड़ाते हुए, आत्मीयता और प्रेम का दृश्य

होली : आत्मीयता का पर्व

होली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख रंगोत्सव है, जो फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। होलिका-दहन असत्य और अहंकार के अंत का संदेश देता है, जबकि रंगों की होली आपसी आत्मीयता को मजबूत करती है। यह पर्व हमें जीवन के विविध रंगों को स्वीकार कर प्रेम और सद्भाव के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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मुश्किल है…

यह पाठ जीवन की कठिनाइयों और नैतिक संघर्षों का दर्पण है। यह बताता है कि सही और अच्छा बने रहना जितना सुनने में आसान लगता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन है। चाहे परिवार और अपनों के साथ संबंध हों या समाज की अपेक्षाएँ, हमेशा सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। लेखक अपने भीतर और बाहरी दुनिया में छिपे संघर्षों को उजागर करता है—अपने अंदर के रावण को पहचानना और उसे नियंत्रित करना, सही और गलत के बीच अंतर समझना, और स्वार्थी दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों की तलाश करना। यह न केवल व्यक्तिगत जुझारूपन का वर्णन है, बल्कि समाज और मनुष्य के अंतर्मन की जटिलताओं की भी गहरी झलक देता है।

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चूरन वाली चाची

विद्यालय के बाहर छोटी-सी दुकान लगाए बैठी चूरन वाली चाची जी बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक हैं। झरबेरी के रंग-बिरंगे बेर, गुड़ वाली लाल इमली, संतरे वाला कम्पट और नमक लगा कमर उनका हर स्वाद मानो बचपन की जेब में छुपी खुशी जैसा। न दिखावा, न चालाकी बस सादगी, अपनापन और शुद्ध स्वाद का भरोसा। सच में, पूरे दिल से भोली-भाली थीं चूरन वाली चाची जी।

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रेत से ख़्वाब आँखों में आफ़ताब

ज़िंदगी हर रोज़ रेत-सी थोड़ी-थोड़ी फिसलती जाती है, और आँखों में ख्वाब आफ़ताब की तरह जलते हैं। कामयाबियों की चर्चा तो सब करते हैं, मगर नाकामियों से जब सामना हुआ था, उसका भी कभी हिसाब देना पड़ेगा। समाज की यही रीत है कि वह चैन से जीने नहीं देता और अनचाहे सवालों के जवाब मांगता है। दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने वालों को पहले अपनी करतूतों की किताब खोलकर देखनी चाहिए। फकीर फकीर ही रहा, क्योंकि उसने चापलूसी नहीं की – वहीं नवाब बनते गए जो मीठी बातों में उलझे रहे। लेकिन जिसने सच कहा, वो हमेशा गलत समझा गया। फिर भी, अपने विश्वास की चाल न टूटी है, न टूटेगी।

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महंगाई और आर्थिक संघर्ष से जूझते भारतीय मध्यमवर्ग को दर्शाती व्यंग्य कविता की यथार्थवादी छवि।

एक मध्यमवर्गीय की दास्तान

“एक मध्यमवर्गीय की दास्तान” भारतीय मध्यमवर्ग के संघर्ष, महंगाई और बदलते सामाजिक परिवेश पर तीखा लेकिन संवेदनशील व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कविता में सोना, रोजमर्रा की जरूरतें और आधुनिक जीवनशैली के बीच पिसते आम इंसान की स्थिति को प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है।

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अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।

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मेरा श्रृंगार

यह कविता उस प्रेम की है जहाँ साथी केवल जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन का श्रृंगार बन जाता है। मेंहदी की खुशबू, चूड़ियों की खनक और पायल की रुनझुन सब उसी के स्पर्श से अर्थ पाते हैं। सुख–दुख में साथ निभाने वाले प्रेम के उस रूप को यह पंक्तियाँ समर्पित हैं, जो मोह-माया से परे होकर भी दिल पर अपना गहरा रंग छोड़ जाता है. जैसे आत्मा का श्रृंगार।

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संयुक्त परिवार में नई बहू और बड़ी महिला के बीच बनते अपनापन और भावनात्मक रिश्ते का दृश्य।

टूटता साथ

यह अध्याय रिद्धिमा की आत्मकथा का संवेदनशील हिस्सा है, जिसमें वह एक नई बहू के साथ बने अपनापन, विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव को याद करती है। रिश्तों की खूबसूरती और उनके भीतर छिपी नाज़ुक सच्चाइयों का मार्मिक चित्रण इसमें उभरता है।

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भय

“अब का भूल जाओ सब और अपनी छोटी बेटी पर ध्यान दो” — कहकर मातादीन छोटे ठाकुर की गाड़ी चलाने चला गया। राधा की मौत से टूटा, मगर डर से बंधा बाप अपने आंसू निगल गया। ये सिर्फ़ एक बेटी की कहानी नहीं, पूरे सिस्टम की चुप्पी की चीख़ है, जहां ज़िंदगी से ज्यादा बड़ी होती है रोटी की मजबूरी और डर।

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सच या मान्यता ?

हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही देखने और मानने लगते हैं। यही प्रवृत्ति “कंफर्मेशन बॉयस” कहलाती है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो, हमारा दिमाग उसे उसी रूप में देखना चाहता है जैसा हम मानते हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति, विचार या विचारधारा से जुड़ने के बाद हम उसकी गलतियाँ भी नजरअंदाज कर देते हैं। असल में दिक्कत सच्चाई में नहीं होती दिक्कत हमारे देखने के “चश्मे” में होती है। कई बार दाग हकीकत में नहीं, चश्मे पर ही होते हैं।

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