अरावली केस : सुप्रीम कोर्ट की अपने ही आदेश पर रोक

अरावली पर्वतमाला से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को जारी अपने ही आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी और तब तक किसी भी तरह की खनन गतिविधि नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार और अरावली क्षेत्र से जुड़े चार राज्यों राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्लीसे इस मामले में जवाब तलब किया है।

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ऐसा होता तो कैसा होता…

कभी-कभी मन सोचता है अगर दुनिया हमारी इच्छाओं के हिसाब से चलती, तो कैसी होती?
शायद इतनी मीठी कि चॉकलेट, आइसक्रीम, बर्गर और पिज़्ज़ा खाकर भी जेब हल्की न होती।
शायद इतना आसान कि इतिहास और भूगोल की जगह कार्टून और गानों के इम्तिहान होते, जहाँ गलत जवाब देने पर भी मुस्कुराहट मिलती।
कल्पना की इस रंगीन दुनिया में हम हमेशा बच्चे रहते न चिंता, न बोझ, न कल की फिक्र।

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आधुनिकता बनाम परंपरा को दर्शाता भावुक और प्रेरणादायक कलात्मक चित्र

मेरे नयन तरस गए भगवन

यह कविता वर्तमान समाज की बदलती सोच, सोशल मीडिया के प्रभाव और घटते संस्कारों पर गहरी चोट करती है। धरती माँ की पुकार के माध्यम से यह रचना वीर शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान योद्धाओं के आदर्शों को पुनर्जीवित करने का संदेश देती है। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के संवादों के जरिए यह कविता आत्मचिंतन, संस्कार और वीरता को फिर से अपनाने की प्रेरणा देती है।

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सवाल मैं, जवाब में सन्नाटा

वो सबके लिए मोहब्बत बरसाता है, लेकिन मुझे किसी तमाशे की तरह अनदेखा कर देता है। उसकी रहमतें जब हर गली को भिगोती हैं, तब भी मैं सूखी ही रह जाती हूँ। जिसे कभी पलकों पर बिठाया था, वही मेरी आँखों में कांटे चुभो जाता है। मैं अपने सवालों में उलझी रहती हूँ, और वो जवाबों में सन्नाटा छोड़ जाता है। दूसरों की ज़िंदगी में वो सौ रंग भर देता है, मगर मेरे हिस्से हमेशा अंधेरा ही आता है। वो खुद भीड़ का हिस्सा बनकर चल पड़ता है, और मुझे तन्हाई में छोड़ जाता है। जब भी लौटता है शहर से, “गौरी”, तो बस उदासी का कोई नया किस्सा दे जाता है।

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एक भारतीय महिला पारंपरिक घर की देहरी पर आत्मविश्वास के साथ खड़ी है।

नारी की गरिमा

यह कविता नारी के जीवन-संघर्ष, त्याग, सहनशीलता और आत्मसम्मान को स्वर देती है। समाज की चुनौतियों के बीच अपनी गरिमा बनाए रखने वाली स्त्री के अदम्य साहस का भावपूर्ण चित्रण करती है।

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विश्व पुस्तक मेले में उज्जैन की गूंज: ‘व्यंग्य के रंग’ में शामिल डॉ. हरीशकुमार सिंह

राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘व्यंग्य के रंग’ में उज्जैन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरीशकुमार सिंह की रचना का चयन शहर के लिए गौरव का विषय बना।

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सामाजिक संघर्ष, गरीबी और मानवीय विवशता को दर्शाता एक यथार्थवादी भावनात्मक दृश्य।

मंटो, सच आज भी वही है दोस्त…

“मंटो… सच आज भी वही है दोस्त…” समाज, ज़रूरत, गरीबी और संवेदनहीनता की उन परतों को उजागर करती कविता है, जहाँ हालात इंसान और व्यवस्था दोनों को बेनकाब कर देते हैं।

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गाँव की पगडंडी पर स्कूल बैग लेकर मुस्कुराती हुई एक मासूम बालिका, संतोष और सादगी का प्रतीक।

संतुष्ट मुस्कान

अधूरी इच्छाओं और भागती जिंदगी के बीच सच्ची संतुष्टि कहाँ मिलती है? “संतुष्ट मुस्कान” कविता एक मासूम बालिका की मुस्कान में जीवन का गहरा दर्शन खोजती है।

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खिड़की के पास खड़ी सांवली भारतीय महिला, चेहरे पर शांति और प्रेम की अनुभूति, कंधों पर पड़ती हल्की धूप।

देह पर ठहरा मौसम !!

“देह पर ठहरा मौसम!!” एक ऐसी संवेदनशील कविता है जिसमें प्रेम के प्रथम स्पर्श, स्मृतियों की गर्माहट और आत्मा तक उतरती अनुभूतियों को बेहद कलात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।

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