उस दोपहर..

दूर तक अजगर की तरह फैली सड़क पर सारे दिन बस कार और मोटरसाइकिल का रेला बहता रहता है। इस बहाव को देखकर लगता है कि यह छोटा सा कस्बा कब सोता है और कब जागता है, कौन जाने। 

राबर्ट्सगंज का इलाका जहां निवेदिता रहती है, सामने ही घर से चार फर्लांग की दूरी पर रेल की पटरियां बिछी हैं, यह एक तीन मंजिला मकान है जहां निवेदिता रहती है। मकान के पीछे मीलों फैले खेत और तरह-तरह के पेड़ गहराती रात में अजीब सरसराहट पैदा करते हैं। निवेदिता की शादी को अभी ज्यादा दिन नहीं बीते, बस छह महीने ही तो हुए हैं इस घर में आए। वह अब तक रेल की पटरी को पार करके सड़क के उस पार नही गई। सामने दिन में सड़क की रफ्तार और बीच में पटरियों की काली रेखा उसे सड़क तक जाने से रोक देती है।

निवेदिता जब भी फुर्सत मे होती है अपने घर की तीसरी मंजिल से सड़क को देखा करती। बारिश के दिनों में धुंधलाते सूरज वाला यह कस्बा बहुत से मायनो में बिल्कुल अलग है। चारों और से मिट्टी की सौंधी खुशबू से मन में अजब तरंगें उठने लगती है, पर उसकी मन की तरंगों को जो महसूस करे वो यहां है ही कहां…

मिट्टी की खुशबू और हरियाली के बिखरे चटख रंग, बारिश के दिनों में स्कूल जाते भीगते बच्चे, बस और रिक्शा की आपाधापी, सब कुछ कितना सुहावना, कितना मुग्धकारी है इन्हे देखना। अचानक से निवेदिता की आंख नम होने लगती है, उसे अपने घर वालों की याद आने लगती है। पापा एक डॉक्टर थे, दो बहनों की शादी के बाद उसकी शादी बड़े चाव से की थी। लड़का मिर्जापुर की एक सीमेंट फेक्ट्री में मैनेजर था, पापा बड़े खुश थे। मिर्जापुर से कुछ ही दूर राबर्ट्सगंज में लड़के का तीन मंजिला मकान और अकेला लड़का, और घर के पीछे ही मीलों तक फैला खेत, जहां हर प्रकार के सब्जी और फल लगे हैं। और क्या चाहिए, एक शुभ मुहूर्त देखकर वो रोहित की ब्याहता बन गई। कहां इलाहाबाद जैसे शहर में पली-बढ़ी निवेदिता और कहां उसक ससुराल जिसे वो न शहर कह सकती है न गांव – पर वो जमाना विरोध करने का नहीं था सो चुपचाप बिन कहे मंजूरी दे दी।

यह घर बिल्कुल बाहरी इलाके में है, आसपास कुछेक घर हैं। रोहित से पहली मुलाकात मे उसे कुछ भी रोमांटिक जैसा महसूस नहीं हुआ, पहली मुलाकात में वो यह बताना नहीं भूला कि उसे यही रहना है। वो हफ्ते के अंत में मिर्ज़ापुर से आएगा। इस उम्र में अपने मां-पिता को अकेला नहीं छोड़ सकता। निवेदिता क्या बोलती, वो न हां कह सकी, न ही न। दूसरे दिन रोहित चला गया, रोहित के जाते ही जैसे ज़िन्दगी ने भी खामोशी अख़्तियार कर ली। निवेदिता के खामोश जीवन में आवाज़ों के पुल बांधती यह रेलगाड़ी और स्कूल की ओर जाते यह भागते-दौड़ते बच्चे। दिन के खत्म होते-होते अजब सी बेचैनी निवेदिता के ऊपर तारी होने लगती। उसकी बड़ी इच्छा होती कि वो भी पटरी के उस पार जाए और इन बच्चों जैसी बन जाए, बारिश में भीगे इनके साथ, भागे-दौड़े। रोज सुबह सोचती कि आज जरूर यह पटरी पार करूंगी पर शाम आते-आते अपने ही फैसले पर हंसी आने लगती। वो इस घर की नववधु है, कौन जाने देगा उसे उस पार। आजकल-आजकल करते उसकी शादी को छह महीने बीत गए, पर वो रेल की पटरी पार करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। रात को अक्सर वो सपना देखती – पटरी के पारवो दौड़ रही है, न जाने कहां!

सड़क पर जमा रेत और आते-जाते वाहनों से टकराते आवारा सी वो यहां-वहां भाग रही है, धूल के गुबार में डूबी सड़क के किनारे उगे पेड़ की छांव से खेलती-खेलती खेत के नजदीक पहुंच गई। अचानक लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया बदल गई, अबूझ अनसुलझे रहस्यों से भरी नरम गरम यह रंगीन ज़िन्दगी।

थोड़ा डर, और थोड़ा रोमांच लिए, निवेदिता अचानक नींद से जाग उठी। सूरज, जंग में, पिघलती हुई धरती के आग के कुएं में खाक होता वक्त निवेदिता को टीस पहुंचाता रहता है। आजकल-आजकल करते, हाथ से कितने दिन खिसकते जा रहे हैं। रोहित हफ्ते में एक दिन आता है और अपनी ड्यूटी पूरी कर सोमवार सुबह चला जाता है। लेकिन निवेदिता के सामने एक पूरा हफ्ता होता है; यह वो कैसे काटती है, वही जानती है! अब अक्सर रातों को छत पर जाकर वह तारे गिना करती है, तारे गिनना उसका प्रिय खेल हो गया है इन दिनों। 

सुबह का सूरज फूटते ही घर का सारा काम निपटा दिया। सर्द मौसम है, यानी धूप से दोस्ती के दिन! घर के पिछले दरवाजे पर निवेदिता कम ही जाती थी, लेकिन आज न जाने क्यों, दरवाज़े के उस पार उसे खेत पर जाने की सूझी। निकल पड़ी वह, खेत की पगडंडी पर, गीली मिट्टी से बचते-बचाते, किनारे उगे पेड़ की छांव से खेलते-खेलते और पहुंच गई खेत के बीचों-बीच। अचानक निवेदिता को ऐसा लगा, जैसे उसका जीवन बदल सा गया हो। 

खेतों में अनाज की बेलें आकाश की नीलिमा को मथते, समंदर की तरह छलांगें मार रही थीं। आम और कटहल के पेड़ों के सहारे बनी छोटी-छोटी पत्तियों की बेलें, ऊपर आसमान में किसी झंडे की तरह अपना पताका फहरा रहीं थी। कुछ ही दूर पर एक मिट्टी का चूल्हा जो शायद अभी-अभी लीपा गया था, आसपास मिट्टी के इत्र की तरह महक रहा था। 

निश्चिंत सी निवेदिता आगे बढ़ती रही। सामने ही एक बड़ा सा कुआं दिखा, जिसे दो बैल उससे जुड़े पहियों को खुद ही घुमा रहे थे और एक बड़ी सी नाली से पानी झिर-झिर कर खेतों में जा रहा था। निवेदिता वहीं थमी सी, बैलों को चक्कर लगाते देखती रही, मगर बैलों को निवेदिता के वहां होने का कोई भान नही था, वे पहले की तरह धीरे-धीरे चलते रहे, एक छोर से दूसरे छोर तक। अभी वो सोच ही रही थी – यहां किसी को तो होना चाहिए, और देखती है कि सामने ही आंवले के बड़े से पेड़ के नीचे एक लड़का सोया हुआ नज़र आता है। उम्र में करीब सोलह–सत्रह वर्ष, गंदी सी सफेद शर्ट पहने वह लड़का अपनी बांह का तकिया बनाकर उसी पर अधलेटा, सीटी पर कोई फिल्मी धुन बजा रहा है। निवेदिता पर नज़र पड़ते ही, वह लड़का चौंक कर कपड़े झाड़ते हुए उठ खड़ा हुआ। 

निवेदिता को अचानक देख वो आगे की ओर जाने ही वाला था कि निवेदिता ने उसे रोका और पूछा – ‘तुम कौन हो? और क्या करते हो?’

‘मैं इस खेत की रखवाली करता हूं, वो बैल और पक्षी, सभी से मेरी बड़ी दोस्ती है।’ लड़के ने बड़े गर्व से बताया। 

‘अच्छा तो मुझसे भी दोस्ती करोगे?’ – निवेदिता के मुंह से औचक ही निकल पड़ा। 

‘आपसे…..?’, और फिर प्रत्युत्तर में लड़का चुप रहा। तभी निवेदिता के बगल से एक गिलहरी सरसरती हुई गुजर गई, गीली-चिकनी मिट्टी में बड़ी फुर्ती से पैर रखकर लड़का कुएं के मुहाने पर बैठकर बैलों को और जल्दी चलने का निर्देश देने लगा, उसकी सीटी से फिर कोई फिल्मी धुन निकालने लगी और निवेदिता मुग्ध भाव से वहीं खड़ी रहकर सीटी सुनने लगी। 

कुएं के चारों ओर चलते बैल सीटी की आवाज़ में और विभोर हो गए और अपनी चाल ज़रा सी और तेज़ करदी। बैल के गले में बजते घुंघरू सीटी के साथ मिलकर मंत्रमुग्ध करने वाला संगीत पैदा कर रहे थे और निवेदिता अपनी थमी ज़िन्दगी में जैसे जीने की रफ्तार यहां देख रही थी। रुकी हुई ज़िन्दगी में जैसे किसी ने अपने मधुर तार छेड़ दिए हों। वो मासूम सा लड़का अपनी सीटी में मग्न था और निवेदिता अपने विचारों में। 

निवेदिता गीली–चिकनी मिट्टी से खुद को बचते-बचाते जैसे ही घर जाने के लिए मुड़ी, लड़का दौड़कर ज़मीन में बिखरे कुछ कच्चे, कुछ पके आम और आंवला लेकर निवेदिता की ओर बढ़ाकर बोला – ‘आप रोज़ आया करो यहां, कल से मैं आपके लिए रोज़ फल तोड़कर रखूंगा।’ 

रोज़ आने की बात सुनकर निवेदिता सोच में पड़ गई – क्या वो रोज़ यहां आ सकती है? आज भी तो किसी तरह से आई है और कितनी देर होगई है उसे घर से बाहर निकले, हालांकि वो अपनी सास से तो पूछकर ही निकली थी घर से, मगर अब उसे थोड़ा डर सा लगने लगा था। 

निवेदिता ने वे फल ले लिए और तेज़-तेज़ कदमों से अपने घर की ओर चल पड़ी। बैल अभी भी कुएं के चारों तरफ चक्कर लगा रहे थे और निवेदिता के मन में ‘चक्कर लगाते हुए बैलों’ का दृश्य बैठ गया था। उसकी भी ज़िंदगी बैल जैसी हो गई है। क्या बैल जानता है कि वो कब से कुएं का चक्कर लगा रहा है? शायद भोर से ही वो यूंही गोल-गोल घूम रहा है। क्या निवेदिता भी इसी बैल की तरह ज़िन्दगी जी रही है? वो भी तो ज़िन्दगी के घेरे में घूम रही है। बैल के घेरे में कुआं है और उसके घेरे में रोहित। बैल चाहे जितने चक्कर लगाले, कुआं तो अपनी जगह स्थिर है; कुएं को बैल के चक्कर लगाने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला।

कुएं से पानी निथर-निथर कर खेत की मिट्टी को और गीला और चिकना कर रहा है और वह निवेदिता इस सोच में डूब गई – पत्थरों पर से निकलते पानी को यह धरती निगल रही है या खेत…… कौन जाने?

सृष्टि उपाध्याय,सुप्रसिद्ध साहित्यकार

पता : फ्लैट नं 305, मालव कुंज, ए ब्लाक, संवाद नगर 

इंदौर ( म.प्र.) 452001

One thought on “उस दोपहर..

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    – सुरेश परिहार

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