संघर्षों से निकली मंजुषा नागपुरे की प्रेरक कहानी
पुणे:
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेता मंजुषा नागपुरे को 9 फरवरी (सोमवार) को पुणे महानगरपालिका की महापौर के रूप में निर्विरोध चुना गया। उनका यह सफर केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और आत्मबल की मिसाल है। कठिन परिस्थितियों में पली-बढ़ी मंजुषा नागपुरे आज पुणे जैसे बड़े शहर की प्रथम नागरिक बनी हैं।
मूल रूप से धुले जिले की रहने वाली मंजुषा नागपुरे का जन्म वर्ष 1979 में हुआ। 1980 के दशक के अंत में उनका परिवार पुणे आया, जब उनके पिता, जो एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे, नौकरी के सिलसिले में कुवैत चले गए। इसी दौरान कुवैत-ईरान युद्ध छिड़ गया, जिसमें उनके पिता को हिरासत में ले लिया गया। परिवार का संपर्क टूट गया और आय का एकमात्र स्रोत भी समाप्त हो गया।
इस संकट ने पूरे परिवार को झकझोर दिया। रिश्तेदारों ने साथ छोड़ दिया और मंजुषा की मां को परिवार के भरण-पोषण के लिए अपने गहने तक बेचने पड़े। हालात इतने कठिन हो गए कि उनकी बड़ी बहन को पढ़ाई छोड़नी पड़ी। हालांकि, मंजुषा ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। दसवीं कक्षा के बाद उन्होंने परिवार की मदद के लिए स्पोकन इंग्लिश पढ़ाना शुरू किया।
वर्षों की कोशिशों, सरकार को लिखे गए पत्रों और अपीलों के बाद मंजुषा के पिता आखिरकार घर लौटे। यह पल परिवार के लिए भावनात्मक था। मंजुषा के अनुसार, इलाज के बाद उनके पिता धीरे-धीरे सामान्य जीवन में लौट सके।
राजनीतिक सफर की बात करें तो मंजुषा नागपुरे ने वर्ष 2012 में भाजपा से राजनीति में प्रवेश किया। वे इससे पहले सिंहगढ़ क्षेत्र की नगरसेविका रह चुकी हैं। उनके पास प्रबंधन (मैनेजमेंट) में स्नातकोत्तर डिग्री है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से भी सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। महापौर पद के लिए उनके प्रतिद्वंद्वियों द्वारा नाम वापस लेने के बाद वे निर्विरोध निर्वाचित हुईं। परशुराम वाडेकर को उपमहापौर चुना गया। हाल के चुनावों में भाजपा ने पुणे महानगरपालिका की 165 में से 119 सीटें जीतकर मजबूत स्थिति बनाई है।
महापौर के रूप में मंजुषा नागपुरे ने कहा कि उनकी प्राथमिकताएं महिलाओं के लिए स्वच्छता सुविधाएं, ट्रैफिक जाम, अतिक्रमण और रोज़मर्रा की नागरिक समस्याएं होंगी। उन्होंने कहा, “ये आम नागरिकों से जुड़े मुद्दे हैं और इनके लिए समयबद्ध व ठोस समाधान जरूरी हैं।” संघर्षों से निकलकर नेतृत्व तक पहुंची मंजुषा नागपुरे की कहानी आज पुणे ही नहीं, पूरे देश के लिए प्रेरणा है।