एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

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चर्चे थे मुख्तियार भाई की बेलबॉटम की मोरी के

जब राजेश खन्ना का जादू ढल रहा था और अमिताभ बच्चन का दौर उभर रहा था, तब कस्बाई जवानी भी बड़े परदे की नकल में अपने सपने सिलवा रही थी। महिदपुर रोड पर फैशन का मतलब था मुख्यत्यार भाई की बेलबॉटम की मोरी, जमीन से रगड़ खाती पैंट और उसे बचाने के लिए लोहे की चेन का अनोखा जुगाड़। यह सिर्फ पहनावा नहीं था, बल्कि उस समय की जवानी का स्वाभिमान, जिद और रचनात्मकता थी, जिसने छोटे शहर को भी अपने तरीके से ‘स्टाइलिश’ बना दिया।

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गुड़ वाली चाय और मैं

गुड़ वाली चाय और मैं दोनों थोड़े देसी, थोड़े अनगढ़, पर पूरी तरह ईमानदार। जैसे गुड़ अपने रंग को धीरे-धीरे पानी में खोलता है, वैसे ही मेरी मिठास भी समय लेकर सामने आती है। सादगी में भी स्वाद छिपा होता है, यही हमें एक-दूसरे से जोड़ता है।

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अटल ललाम: राष्ट्रभक्ति और नेतृत्व की प्रतिमा

25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटल जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, कवि, वक्ता और प्रधानमंत्री थे। उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा, जनजागरण और राष्ट्रप्रेम की अलख जगाई, और भारत को परमाणु शक्ति के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाई।

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जमीन

दीनानाथ त्रिपाठी ने अपने भतीजे राजू को समझाया कि माता समान इस जमीन को बेचने का विचार गलत है। परिवार की परंपरा, मेहनत और भविष्य की सुरक्षा के लिए जमीन अनिवार्य है, जबकि राजू शहर और विदेश के खर्चों के कारण जल्दबाजी में निर्णय लेना चाहता था।

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‘अर्घ्य’ मराठी काव्य संग्रह का विमोचन

मुंबई में संपन्न हुई काव्य गोष्ठी में युवा कवि उमेश चव्हाण के मराठी काव्य संग्रह ‘अर्घ्य’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में प्रमुख साहित्यकारों और कला-संस्कृति के गणमान्य व्यक्तियों ने पुस्तक की प्रशंसा की और कवियों ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।

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शून्य में गूँजती आवाज़ें

तेरे जाने के बाद, फूल खिलते रहे और चाँद उगता रहा, पर दुनिया बेरंग और सपाट दिखने लगी। नदी की कल-कल में संगीत नहीं, बस छलछलाहट सुनाई पड़ने लगी। परिंदों की चहचहाट भी अब चुभने लगी, क्योंकि तुम मुझसे बहुत दूर चली गई। आवाज़ भी दूँ तो शून्य से टकराकर लौट आती है।

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मुक्ति की राह : ज्ञान, कर्म और परमधाम

आत्मा परमधाम की वासी है—पवित्र, दोषरहित। स्थूल लोक में कर्मों के प्रभाव से वह अपवित्र होती है, इसलिए स्वयं परमात्मा आकर ज्ञान के माध्यम से आत्मा को फिर से पावन बनाते हैं और उसे मुक्ति की ओर ले जाते हैं।

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दिल पिघल गया

नन्ही रवनीत ने अपने अतिरिक्त जूते सहपाठी खुशी को देकर यह सिखा दिया कि संस्कार केवल शब्द नहीं होते, वे संवेदना बनकर जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान भी बनते हैं।

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