मुझे ऐतराज़ है…

यह लेख कैशलेस दौर के बीच घरेलू महिलाओं की उन छोटी-छोटी खुशियों को स्नेहिल व्यंग्य के साथ सामने रखता है, जो डिजिटल भुगतान की सुविधा में कहीं खो गई हैं। पति-पत्नी के साधारण संवाद के माध्यम से लेखिका स्मृतियों, आत्मसम्मान और भावनात्मक अधिकारों की बात करती हैं—जहाँ पति केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि भरोसेमंद “एटीएम” भी हुआ करते थे।

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अँधेरे में जुगनू

यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और आत्मसंवाद का सूक्ष्म आख्यान है। चाँद और बाहरी रोशनी को ठुकराकर कवयित्री अपने भीतर के जुगनुओं की रोशनी पर भरोसा करती है। लेकिन प्रेम की इच्छा जब प्रतीक्षा का दीपक बन जाती है, तो वही रोशनी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। यह रचना उस क्षण को पकड़ती है, जब मन अँधेरे से डरता नहीं, बल्कि उसे शांति और मुक्ति का स्थान मानने लगता है।

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जड़ें और बेलें

यह कथा कार्यस्थल पर छिपे शोषण और नकली सहयोग की पहचान कराती है। अमरबेल के सशक्त प्रतीक के माध्यम से यह संदेश देती है कि जिनकी अपनी जड़ें नहीं होतीं, वे दूसरों की मेहनत से पनपते हैं। आत्मबोध और सीमाएँ तय करना ही आत्मरक्षा और सशक्तिकरण का पहला कदम है।

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नया साल

यह रचना सालों के बदलने के बहाने मनुष्य की आदतों, हिंसा और संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य है। 2025 और 2026 के संवाद के माध्यम से कवि यह प्रश्न उठाता है कि क्या नया साल सच में नया होता है, या वही पुरानी शरारतें नए कैलेंडर के साथ आगे बढ़ जाती हैं।

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पुश्तैनी घर

पुश्तैनी घर ईंट-पत्थर नहीं होते, वे पीढ़ियों की साँसें सँजोए रहते हैं। उनकी दीवारों में हँसी की गूँज, डाँट की तपिश और रिश्तों की गर्माहट कैद रहती है। जब हम उन्हें छोड़ देते हैं, वे धीरे-धीरे खंडहर नहीं, मौन पीड़ा में बदलते हैं जीते-जी मरते हुए।

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श्रीदेवी चश्मे में

मोबाइल और वीडियो गेम से पहले हमारा बचपन माचिस की छापों और फिल्मी पोस्टरों में बसा था। छाप खेलते हुए रेल पटरियों पर खज़ाना ढूँढना, रेयर माचिस पर रौब दिखाना और फिर ताश जैसे पत्तों में दांव लगाना“श्रीदेवी चश्मे में!”ये सिर्फ़ शब्द नहीं, पूरे दौर की धड़कन थे। वह खेल बिना पैसों का था, पर यादों से भरपूर।

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मध्यप्रदेश के मांडू का भावनात्मक और ऐतिहासिक वर्णन, जहाँ खंडहरों की खामोशी, महलों की भव्यता, मानसून की वादियाँ और रात में दूर से आती बाँसुरी व लोकगीतों की आवाज़ें प्रेम और विरह का वातावरण रचती हैं. रानी रुपमती और बाज बहादुर की अमर प्रेमकथा, नर्मदा दर्शन वाला महल, मुगल काल का संघर्ष, बलिदान, समाधियाँ और सदियों बाद भी हवा में सांस लेता प्रेम मांडू को सिटी ऑफ लव के रूप में प्रस्तुत करता है.

अपनी-अपनी रुपमती : ‘मांडू’ सिटी ऑफ लव

दुनिया मांडू को सिटी ऑफ जॉय कहती है, लेकिन जो एक बार उसे ठहरकर महसूस कर ले, उसके लिए मांडू हमेशा सिटी ऑफ लव ही रहता है। मध्यप्रदेश के तमाम पर्यटन स्थलों में अगर किसी जगह की हवा में सबसे ज़्यादा भावनाएँ घुली हैं, तो वह मांडू है। यहाँ महलों की भव्यता से ज़्यादा, खंडहरों की खामोशी बोलती है।

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सीमाओं के भीतर उड़ान

वह किसी पोस्टर पर छपी निडर स्त्री नहीं थी. न ही हर बहस में आगे बढ़कर अपनी ताक़त साबित करने वाली कोई प्रतीकात्मक नायिका. अनन्या उन अनगिनत महिलाओं में से एक थी, जिनकी शक्ति शोर नहीं करतीवह संतुलन रचती है.

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आधा केक, पूरी खुशी

यह कहानी एक बच्चे के मन में छिपे लालच से शुरू होकर संवेदना और बाँटने की सीख तक पहुँचती है। सड़क किनारे मजदूर बच्चों को बिस्किट बाँटते देख उसका मन बदल जाता है और वह समझ पाता है कि खुशी जमा करने में नहीं, बाँटने में है।

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माँ : जो हर अक्स में खुदा

माँ जो बिना कहे हर दुख समेट लेती है और हर सुख में चुपचाप पास खड़ी रहती है। माँ की उपस्थिति यहाँ दूरी से परे, स्मृति और आत्मा में रची-बसी हुई है—ऐसी शक्ति जो कभी जुदा नहीं होती।

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