
सुरेखा अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
अभिव्यक्तियों को आकार
देने के लिए ढूँढती हूँ
अनुपम अभिव्यंजनाएँ।
समृद्ध शब्दकोश विवादित न हो,
इसलिए खींच देती हूँ
एक दायरा
अपनी ही शब्द-मर्यादा का।
ओजस्व के साथ हल्का श्रृंगार
अपनी मनकही का…
फिर चंद पल यादों से चुराकर
टाँकती हूँ उन पर
सदाबहार का फूल,
जो द्योतक है ज़िंदादिली का।
सुनो न, देव…
बेशक एक आधार तुम,
बेशक एक इंतज़ार तुम,
पर लम्हों के हर आकाश में
बस तुम ही तो हो
एक वर्ण-विन्यास से।
जिज्ञासा हो, चेतना,
प्रतीक्षा या हो विराम
सुनो न,
सब खेल है
अभिव्यंजनाओं का।
सच बहुत ही सुंदर रचना। दायरे बहुत ज़रूरी हैं।
बहुत ही सुंदर रचना