थकान, डिप्रेशन और दिल से जुड़ा अनदेखा रिश्ता
भारत को सूरज का देश कहा जाता है, फिर भी एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने है. हर दस में से लगभग आठ भारतीयों में विटामिन डी की कमी पाई जाती है. वर्षों तक हमें यही सिखाया गया कि विटामिन डी केवल हड्डियों के लिए जरूरी है. सच यह है कि यह सोच उतनी ही अधूरी है, जितना यह कहना कि मोबाइल फोन सिर्फ कॉल करने के काम आता है. हम धूप में रहते हुए भी धूप से दूर हो गए हैं. आज की जीवनशैली हमें घरों, दफ्तरों और स्क्रीन के भीतर कैद कर चुकी है. खिड़की के पास बैठना भले ही उजला लगे, लेकिन कांच सूरज की उन किरणों को रोक देता है, जिनसे शरीर विटामिन डी बनाता है. ऊपर से हमारी त्वचा का रंग. मेलेनिन हमें सुरक्षा देता है, लेकिन वही सूरज की किरणों को छान भी देता है. नतीजा यह कि शरीर को विटामिन डी बनाने के लिए अधिक समय तक तेज धूप चाहिए. शहरी प्रदूषण इस प्रक्रिया को और मुश्किल बना देता है.
डी2 बनाम डी3: असली और नकली चार्जर का फर्क
विटामिन डी2 पौधों से मिलता है, जबकि डी3 धूप और पशु स्रोतों से. डी2 को शरीर उतनी अच्छी तरह नहीं पहचान पाता, जबकि डी3 शरीर में लंबे समय तक असरदार रहता है. यही वजह है कि डॉक्टर और सप्लीमेंट कंपनियां डी3 को प्राथमिकता देती हैं.
कमी का असर सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं
जब शरीर में विटामिन डी कम होता है, तो हड्डियां अंदर से कमजोर होने लगती हैं. धीरे-धीरे यह ऑस्टियोपोरोसिस का रूप ले लेता है. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. वैज्ञानिकों ने पाया है कि शरीर के लगभग हर हिस्से, दिमाग, दिल, मांसपेशियां और इम्यून सिस्टम में विटामिन डी रिसेप्टर मौजूद हैं. इसका मतलब साफ है. शरीर को हर स्तर पर इसकी जरूरत है.कम विटामिन डी का असर मांसपेशियों में दर्द, जल्दी थकान और मामूली मेहनत में सांस फूलने के रूप में दिखता है. दिल भी एक मांसपेशी है और उसे भी डी3 की जरूरत होती है.
डिप्रेशन और विटामिन डी का छुपा रिश्ता
दुनिया इस वक्त दो खामोश संकटों से जूझ रही है. डिप्रेशन और विटामिन डी की कमी. दिमाग के वे हिस्से जो भावनाओं को नियंत्रित करते हैं, वहां भी विटामिन डी रिसेप्टर पाए जाते हैं. यह कहना गलत होगा कि सिर्फ विटामिन डी की कमी से अवसाद होता है, लेकिन यह जरूर सच है कि इसकी कमी मानसिक थकान और चिड़चिड़ेपन को बढ़ा सकती है. लॉकडाउन के दौरान घरों में बंद रहना इस सच्चाई का बड़ा उदाहरण था.
विटामिन डी इम्यून सिस्टम को सिर्फ मजबूत नहीं करता, बल्कि संतुलित भी रखता है. संक्रमण के समय यह शरीर की रक्षा को तेज करता है, और ऑटोइम्यून बीमारियों में सूजन को शांत करता है. हाल के वर्षों में हुए शोध इस भूमिका को साफ तौर पर साबित करते हैं.
गर्भावस्था और दिल की सेहत में भूमिका
गर्भावस्था के दौरान विटामिन डी मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद अहम होता है. यह प्लेसेंटा के विकास, रक्त वाहिकाओं के संतुलन और शिशु के भविष्य के स्वास्थ्य में योगदान देता है. वहीं, इसकी कमी को उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों से भी जोड़ा गया है.
क्या करें और क्या नहीं
थकान महसूस होते ही खुद से सप्लीमेंट शुरू न करें. पहले रक्त जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह लें. कुछ लोग जांच से ठीक पहले हाई डोज लेते हैं, जिससे रिपोर्ट सामान्य दिखती है, इसे गलत सामान्य कहा जाता है.गोलियां या पाउडर भोजन के साथ लें, ताकि शरीर इन्हें बेहतर अवशोषित कर सके. तरल रूप में मिलने वाले सप्लीमेंट अक्सर तेल के साथ आते हैं, जिससे उनका असर बढ़ता है. इंजेक्शन सिर्फ गंभीर कमी में दिए जाते हैं. खुराक हमेशा विशेषज्ञ तय करें. रोजाना 1,000 आईयू हो या साप्ताहिक 60,000 आईयू, अधिक मात्रा हमेशा बेहतर नहीं होती. विटामिन डी शरीर में जमा होता है और अधिक लेने पर नुकसान भी पहुंचा सकता है. विटामिन डी सिर्फ हड्डियों का नहीं, पूरे शरीर का संरक्षक है. धूप के देश में रहकर भी इसकी कमी एक चेतावनी है कि अब सेहत को नजरअंदाज करने का वक्त नहीं है. जागरूकता, सही जांच और संतुलित सप्लीमेंट ही इस खामोश कमी से बचने का रास्ता है.