पूर्वाग्रह

प्रगति त्रिपाठी, प्रसिद्ध लेखिका, बंगलुरु

“इवा.. मैं इस गेम से बोर हो गई,चलो अब साइकिल चलाते हैं।” इवा के घर खेलने आई उसकी दोस्त नायरा ने कहा।
“ओके, चलो।”
“मम्मा.. मम्मा।”
“क्या है बेटा?” कपड़े सुखाती हुई मनोरमा ने पूछा।
“मुझे और नायरा को साइकिल चलानी है।”
“ठीक है, चलो मैं साइकिल नीचे ग्राउंड में पहुंचा देती हूं।”
दोनों बच्चे मनोरमा से पहले साइकिल के पास दौड़ गए और इवा जोर से मम्मी को आवाज देने लगी ” मम्मा,मेरी साइकिल यहां नहीं है? “
साइकिल वहां नहीं है! तो कहां गई?” कपड़ा अरगनी पर छोड़ कर बाहर आई। देखा तो सच में साइकिल वहां नहीं थी। मनोरमा यह देखकर आश्चर्य से भर गई।
“मम्मी .. मेरी साइकिल कहां गई।” इतना कहकर इवा जोर – जोर से रोने लगी।
“सच में साइकिल कहां गई। हमारे अपार्टमेंट से तो कभी कोई चीज चोरी नहीं हुई।” मनोरमा मन ही मन सोचने लगी।
उसने अपने पति अरविंद को फोन लगाया।
तभी स्क्रीन पर मैसेज पाॅप ऑप हुआ ‘ आई एम इन द मीटिंग, काॅल यूं लेटर’।
“उफ्फ… इनको तो ऑफिस और मीटिंग से ही फुर्सत नहीं है।”
“मम्मा मेरी साइकिल किसने ली?”
तभी मनोरमा के दिमाग में कचरा ले जाने वाले भईया की बात कौंधी ” दीदी, आप यह साइकिल मुझे दे देंगी? देख रहा हूं बहुत दिन से धूल चढ़ी हुई है। शायद कोई चलाता नहीं।”
“अरे क्यों भाई? ये तो एक महीने पहले ही अपनी बिटिया के जन्मदिन पर खरीदी है। वो चलाती है इसे।”
“अगर आप यह साइकिल मुझे दे देती तो मेरे बेटे को स्कूल जाने में आसानी होती।” उसने कहा।
“बोला तो एक महीने पहले ही खरीदा है, तुम्हें कैसे दे दूं?।”
इतना सुनकर कचरे वाला कचरा लेकर चला गया ।
“अजीब आदमी है भाई।” मनोरमा बुदबुदाते हुए घर के अंदर चली गई थी। यह घटना एक नहीं दो बार दोहराई गई थी।
“मम्मा। “
बेटी की आवाज सुनकर मनोरमा अपनी सोच से बाहर आई और बोली जरूर उसी कचरे वाले ने तुम्हारी साइकिल चुराई होगी। रूको मैं अभी सोसायटी के हेड गार्ड को खबर करती हूं।
“हेलो, भईया मैं 406 से बोल रही हूं….।” मनोरमा ने उसे फोन करके पूरी राम कहानी सुना दी।
” वो ऐसा नहीं है फिर भी आप को ऐसा लगता है तो मैं अभी उसको लेकर आता हूं।” इतना कहकर गार्ड ने फोन काट दिया और मिनटों में कचरा उठाने वाला स्टाफ मनोज को लाकर मनोरमा के सामने खड़ा कर दिया।
“मैडम , मैने साइकिल नहीं ली है।” वह गिड़गिड़ाने लगा।
“मेरी बच्ची की साइकिल पर तुम्हारी नज़र थी। वापस करो इसकी साइकिल।”
“माना मैंने आपसे साइकिल के बारे में बात की थी लेकिन मैंने साइकिल नहीं ली। आप चाहें तो सीसीटीवी कैमरे में देख सकती है।
“अरे…रे, ये मैंने पहले क्यों नहीं सोचा, सबकुछ कैमरे में कैद हुआ ही होगा। कैसा बेवकूफ है, अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी ली बच्चू ने।” मनोरमा मन ही मन बुदबुदाई।
तभी अरविंद का काॅल आ गया, ” हैलो, किसलिए फोन लगाया था?”
मनोरमा ने उसे सारी बात बताई।
“अरे.. साइकिल मैंने बनवाने के लिए दी है। आज सुबह जब ऑफिस के लिए घर से निकल रहा था तो देखा दोनों टायर पंचर था तो सोचा, रास्ते में बनवाने के लिए दे दुंगा और वापस आते समय ले आऊंगा। “
“अरे.. आपको ये बात बतानी तो चाहिए थी ना!” इतना कहकर मनोरमा ने फोन रख दिया।
मनोरमा, हेड गार्ड और मनोज से नजरें नहीं मिला पा रही थी।

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