हंडिया सी इस घाटी में
एक दिन अवकाश का
दो स्कूप बादल,
रात भर भीगी गुनगुनी हवा,
पेड़ों से छन कर आती
धूप के कुछ कतरे और
अंजुली भर पानी बारिश का
उस पे बुरकना है
तुम्हारे सान्निध्य का
एक छोटा चम्मच मसाला …
बस इतनी सी तो है इच्छा
चलो दोनों मिल आज
ढलते सूरज की मद्धम आंच पर
पकाएं प्रेम थोड़ा सा
बेहद स्वादिष्ट, ऊष्मा से भरी रचना!
आदरणीय साथियों मुझे इस बात की खुशी है कि आप सभी लोग एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते हैं और अपनी राय व्यक्त करते हैं. इसी तरह से वरिष्ठ साथी, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहें और समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहें. आप अपनी रचनाएं नियमित रूप से भेज कर सहयोग करते रहें.
सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज