सोशल मीडिया ने जहां दुनिया को जोड़ दिया है, वहीं दिलों को भी कभी-कभी ऐसे धागों में बांध देता है जिन्हें न तो नाम दिया जा सकता है, न ही नकारा जा सकता है. यह कहानी है चित्रा और आदित्य की एक ऐसी दास्तान, जो न किसी किताब में लिखी गई, न किसी दीवार पर टंगी तस्वीरों में कैद है. ये कहानी दिल से दिल तक बहते एक भाव के नाम है, जो शब्दों से परे था.
चित्रा की ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल सामान्य थी एक जिम्मेदार पति, एक व्यवस्थित घर, एक नए शहर में नई शुरुआत. लेकिन उसके भीतर एक खालीपन था, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पाती थी. वाराणसी में दोबारा बसने के बाद एक शाम, जब सब कुछ शांत था, उसने यूं ही फेसबुक खोला और एक अनजान नाम पर नज़र पड़ी
आदित्य. एक रिक्वेस्ट जो शायद बहुत पहले आई थी, लेकिन अब जाकर खुली.
मैसेज पढ़कर चित्रा को अजीब-सा एहसास हुआ, जैसे कोई पुराना परिचित अनजाने शब्दों में बोल रहा हो. उसने जवाब दे दिया, बस ऐसे ही. पर जवाब का इंतज़ार उस तरफ से मानो कब से था. बातों का सिलसिला शुरू हुआ, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था.
आदित्य का जीवन भी आसान नहीं था. एक जिम्मेदार बेटा, भाई, अकेला, रिश्तों में ठगा हुआ, लेकिन उम्मीद से भरा हुआ. उसे किसी ऐसे साथी की तलाश थी, जो उसे सुने, समझ ेबिना किसी अपेक्षा के. और चित्रा बस इतना चाहती थी कि कोई उसकी खामोशियों को पढ़ ले.
बातों ने रातें चुरा लीं, और हँसी ने थकी हुई सांसों को रौशनी दी. दोनों ने किसी सीमा को पार नहीं किया, फिर भी वो रिश्ता उन सारे रिश्तों से गहरा हो गया जिन्हें समाज नाम देता है.
एक दिन आदित्य ने बताया मेरा रिश्ता तय हो गया है. चित्रा मुस्कुराई, बधाई दी… लेकिन मुस्कान के पीछे एक सन्नाटा पिघलता रहा.
उसे एहसास हुआ कि वो सत्य से प्यार करने लगी हैउससे, जिससे वो कभी मिली नहीं, छू नहीं सकी, लेकिन जिसने उसकी आत्मा को छू लिया था.
जब उसने आदित्य को अपनी भावनाएं बताईं, तो जवाब में कोई आरोप नहीं था, कोई सवाल नहीं. बस एक स्नेहभरी आवाज थी. तुम्हारी भावनाएं गलत नहीं हैं.उस एक वाक्य ने उसे तोड़ भी दिया और संवार भी दिया.
समय बीतता गया. आदित्य ने शादी कर ली, चित्रा वही रही अपनी दुनिया में, अपने संघर्षों के साथ.
आदित्य की पत्नी दिशा जिद्दी थी, कमज़ोर भी लेकिन समय के साथ वो बदलने लगी. उधर, चित्रा और आदित्य के रिश्ते में खामोश दीवारें उठने लगीं.
एक बार, बस एक बार, चित्रा और आदित्य मिले रेलवे स्टेशन पर. भीड़ में खड़ी दो आंखें, जो सब कुछ कह रही थीं, और फिर भी चुप थीं.
रुक जाओ, आदित्य ने नहीं कहा.
मैं रुकती नहीं, चित्रा ने नहीं कहा.
और वो चल दी… जैसे कोई ख्वाब नींद छोड़ कर चला जाता है.
अब भी वे बात करते हैं नियमित नहीं, पर पूरी आत्मीयता से. कोई अपेक्षा नहीं, कोई शिकायत नहीं. एक रिश्ता जो सांस लेता है, लेकिन सांसें मांगता नहीं.
तो क्या यह प्रेम था?
शायद हां.
क्या यह धोखा था?
शायद नहीं.
क्या यह अधूरा था?
नहीं, क्योंकि यह दिल की गहराइयों तक पूरा था.
यह एक ऐसा रिश्ता था जिसे समाज शायद कभी नहीं समझ पाएगा,
लेकिन जिसकी ख़ामोशियां चीख-चीख कर कहती हैं
हम मिले थे, सिर्फ महसूस करने के लिए, बस जुड़ने के लिए.
एक रिश्ता… अनकहा, अनदेखा, पर सबसे सच्चा.
रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
यूं ही कोई मिलता नहीं सरे राह चलते चलते।
ह्रदय अंकित भाव, रहे ना साथ,तो भी साथ साथ चलते।।
गहराई है इस कहानी में। प्रश्न तो हैं, लेकिन कोई उत्तर नहीं !!!