
मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका एवं वाइसओवर आर्टिस्ट, पटना
“वाह! क्या कहानी है! सर, इसे पढ़िए! क्या प्रवाह है! गज़ब की पकड़ है… एक पल के लिए कहानी भटकी नहीं। पढ़ना शुरू किया तो बस पढ़ता ही चला गया!”
“हम्म्म! किसने लिखी है?”
संपादक महोदय ने सहायक से पूछा।
“आं… लेखक! कोई नेहा सोनी है झारखंड से! पर कहानी…”
“परिचय देखो! कोई पुरस्कार मिला है? किताब-विताब निकली है कि नहीं?”
“ना! परिचय में तो बस नाम, पता और ये लिखा है कि लिखना पसंद है, इसलिए लिखते हैं… बस! इतना ही लिखा है!”
“साइड में रख फिर! इतने साधारण लोगों की रचना छापने लगे तो फिर गई हमारी पत्रिका! कौर मैम ने कल वॉट्सऐप पर कोई कहानी भेजी है और मिहिर कुमार जी ने कोई कविता। दोनों को लगाओ और डालो फाइनल प्रिंटिंग में!”
“सर… एक बार इस कहानी को पढ़ लेते तो… कौर मैम की तो दो महीने पहले ही कहानी आई थी पत्रिका में… वही बासी विषय! रही बात मिहिर जी की तो वे क्या लिखते हैं, मुझे आज तक समझ नहीं आया।”
“ओह आलोक! इतने साल हो गए तुम्हें मेरे साथ काम करते हुए, यार, तुम कब समझोगे दुनियादारी! ऐसे नहीं चलता प्रकाशन का काम! तुम्हें क्या लगता है लोग कहानियाँ-कविताएँ पढ़ते हैं? पागल हो तुम! पहले लोग नाम देखते हैं… लेखक का कद देखते हैं… तब खरीदते हैं। नाम बड़ा हो तो कुछेक लाइनों की बेसिर-पैर की कविता के भी कई वीडियो बनते हैं, किताब के पन्नों की तस्वीरें खींची जाती हैं, और कायदे से लेखक को टैग करके तारीफ़ के पुल बाँधे जाते हैं। कुछ नौसिखिए इसी पुल से बड़े बैनर तक पहुँचते हैं! हम भी वहीं ज़रिया हैं, आलोक! हटाओ इसे, और ‘आपकी रचना अस्वीकृत हुई’ — ये सब मेल करने की ज़रूरत नहीं… इतना करने लगे फिर तो… जाओ अब, जितना कहा करो!”
सहायक भारी मन से मिहिर जी की कविता पढ़ने लगा…
इस बार गाँव गया था
वो दिखा!
सुरती बकरी चराते,
गमछा डालकर बीड़ी फूँकते,
कितना निश्चिंत होता है जीवन गाँव में।
और मैं कब निकल पाऊँगा
मेट्रो की भागती-दौड़ती ज़िंदगी से!
और भी पंक्तियाँ थीं, पर सहायक को भी जल्दी थी। उसे दौड़ना था… पत्रिकाओं की रेस है… नाम बनाने के लिए दौड़ लगानी थी… ज़ोर से दौड़ना है…!
वाह ! यथार्थ का चित्रण