तेरी यादों का शहर

तेरी यादों से दिल,

दर-बदर क्यूं नहीं होता.

दिल सख़्त है इस कदर

नम क्यूं नहीं होता.

तेरे कूच-ए-दिल को छोड़ के

जी तो लूं मैं भी मगर,

मेरे दिल-ए-शहर का बसर

हर कहीं नहीं होता.

तिरि यादों में कभी 

मेरा भी जिक्र क्यूं नहीं होता.

रश्मिसिंह, शिक्षिका एवं साहित्यकार, पटना (बिहार)

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