
मीनू राजेश शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, रायपुर
वो शाम भी,
क्या शाम हुआ करती थी |
जब समंदर के किनारे,
मुलाक़ात हुआ करती थी |
आपके कांधे पे सर रख कर,
डूबते सूरज की लालिमा को निहारते थे हम |
समंदर की लहरों में लालिमा का प्रतिबिंब देख,
खो जाया करते थे हम |
समंदर की लहरों से उठती जल तरंगें,
प्यार का सरगम गाती थी |
आपके हाथों में मेरा हाथ,
सारे जहाँ की खुशियाँ देती थी |
समंदर किनारे,
खेलते बच्चों की आवाजें |
मासूमियत से भरे,
कई दृश्य थे |
आज भी वही शाम है,
वही समंदर का किनारा है |
वही लहरें, वही लालिमा है;
पर मेरा हमसफ़र, जाने कहाँ है?
आज मैं किनारे पर खड़ी,
समंदर को निहारती हूँ |
गुजरे हुए उस पल को,
गुजारे उन लम्हों को संजोती हूँ |
तड़पती हूँ आपके लिए,
आपके साथ के लिए, आपके प्यार के लिए |
लौट आओ फिर मेरी दुनिया में,
इतनी सी इल्तज़ा है ।
Wow very nice 👍👍
बहुत सुंदर सृजन दीदी है🍁🍁🍁🍁🌹🌹🌹🌹
सुन्दर रचना