
पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ
आजीवन कैदी बनकर रह जाती हैं
डायरी के पन्नों में…
हाँ…
कितना भी सिर पटक लें,
कितना भी प्रयत्न कर लें,
परंतु उनके भाग्य में नहीं होता
उगते सूरज का प्रकाश,
खुली हवा का एहसास,
उन्मुक्त पंछियों की उड़ान,
और खुला आसमान।
हाँ…
मानो जैसे काला पानी की
सजा काट रही हो…
हाँ, काला पानी की सजा,
जहाँ से जीते जी
रिहाई तो नामुमकिन है ही।
परंतु…
जब तक जीना है,
साँसों को ढोना है,
वो भी सिसक-सिसक कर।
हाँ…
गवाही देते हैं डायरी के
वो पीले पन्ने, अपनी बेबसी और लाचारी की…
सुबूत हैं वो धुंधले अक्षर,
अपने तिरस्कार और अपमान के,
जो समय के थपेड़ों के साथ
आज भी मजबूर हैं
अंदर ही अंदर कुढ़ते रहने के लिए,
बिन खता के सजा काटने के लिए।
बहुत आभार आपका
वाह बहुत ख़ूब 👌👌