बड़ी होटल : जब खबरें साँस लिया करती थीं

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

महिदपुर रोड पर खड़ी बड़ी होटल स़िर्फ एक होटल नहीं थी वह उन दिनों पूरे गाँव की धड़कन थी, सूचना का जीवित केंद्र.आज मोबाइल की एक झलक में दुनिया सिमट जाती है, पर तब दुनिया रेडियो की उस भारी-भरकम आवाज़ में बसती थी. बड़ी होटल में लगा वह वाल्व वाला रेडियो किसी अजूबे से कम नहीं था. उसे चालू करने के बाद जैसे समय थम-सा जाता. पहले डायल की मद्धिम रोशनी जलती, फिर साइड में लगा वाल्व धीरे-धीरे गरम होकर हरे रंग में चमक उठता. मानो वह मशीन नहीं, किसी जीव की तरह जाग रही हो. पूरे दस मिनट का इंतज़ार…और फिर आवाज़ गूँजती… आवाज़ इतनी बुलंद कि सड़क पर चलते कदम रुक जाते…जो जहाँ था, वहीं ठिठक जाता….
रेडियो पान की दुकान पर लगा था, जहाँ लच्छू दा (लक्ष्मीनारायणजी पोरवाल) बैठते थे. समाचार शुरू होते ही लोग खड़े-खड़े सुनते, कोई चुपचाप बैठ जाता. गंभीर प्रसारण के समय पिनड्रॉप साइलेंस छा जाता जैसे पूरी बस्ती एक साथ साँस रोक लेती हो. देश-दुनिया में कहीं कुछ भी घटता, उसकी पहली गूंज यहीं सुनाई देती.मोरारजी देसाई का प्रधानमंत्री बनना, 9वें एशियाई खेलों की खबरें,गुड़गांव फैक्ट्री से निकली पहली मारुति 800,ऑपरेशन ब्लू स्टार,स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा की अंतरिक्ष यात्रा, कोलकाता मेट्रो का पहला स़फर,
और फिर वह मनहूस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या…
इन खबरों के साथ स़िर्फ शब्द नहीं आते थे, भावनाएँ आती थीं खुशी, गर्व, डर, शोक..और हर भावना का गवाह वही रेडियो बनता था. लच्छू दा कभी-कभी मूड में होते तो बुधवार की रात बिनाका गीतमाला भी लगा देते…लेकिन ज़्यादातर समय रेडियो खबरों के लिए ही चलता था..क्योंकि सौभागदा और हिम्मतदा का अनुशासन सख़्त था यह रेडियो मनोरंजन से ज़्यादा ज़िम्मेदारी था.
ऐसे रेडियो उस दौर में बस तीन जगह थे
बड़ी होटल, शिवनारायणजी पोरवाल की होटल और सतनामसिंहजी का घर…और आज भी, सतनामसिंहजी के यहाँ वह रेडियो चलता हुआ है मानो अतीत अब भी बोल रहा हो…बड़ी होटल सूचना का केंद्र इसलिए भी थी कि यहाँ गाँव का एकमात्र टेलीफोन था. किसी के लिए कहीं से इमरजेंसी कॉल आए पोरवाल परिवार बिना देर किए संदेश पहुँचाता. किसी दूसरे शहर से सामान या चिट्ठी आती पता बस एक ही होता: बड़ी होटल, महिदपुर रोड..
यह सब कोई औपचारिक व्यवस्था नहीं थी, यह थी सेवा की परंपरा,
जो सौभाग्यमलजी के परिवार की रग-रग में बसी थी. आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ बड़ी होटल में स़िर्फ चाय नहीं बनती थी, वहाँ इतिहास उबलता था.
खबरें साँस लेती थीं.. और एक पूरा गाँव..एक रेडियो की आवाज़ में
जुड़ा हुआ था.

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