नियति से बहस नहीं

शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

बचपन से ही मैंने
ख़ुद को पीछे रखकर
सबकी सेवा की।
लोग आश्वासन देते रहे
इसका फल ज़रूर मिलेगा।

फल की कभी चाह नहीं रही,
बस कोई स्नेह से
दो मीठे बोल कह दे
तो वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन जाते।

शायद यही मेरी नियति थी,
या शायद मेरा होना ही
किसी और का सहारा बनने के लिए था।
हर मोड़ पर वही लोग मिले,
जिनकी थकान,
जिनकी ज़रूरत
मेरे हाथों में लिखी हुई थी।

वक़्त चुपचाप
अपनी रेखाएँ खींचता गया,
और ऊपर कहीं
सब पहले से तय था—
किस मोड़ पर कौन मिलेगा,
कहाँ रास्ता बदलेगा,
और किस दर्द से होकर
नया जीवन जन्म लेगा।

यह सच अजीब है,
थोड़ा कठोर भी,
मगर यही जीवन का नियम है
जो मिला है,
उसे पूरे मन से स्वीकारो,
क्योंकि नियति
विवाद नहीं करती।

सच को अपनाने से
जीवन हल्का हो जाता है,
और मन…
धीरे-धीरे मज़बूत।

अब दर्द चुभता नहीं,
क्योंकि मैंने सीख लिया है
ख़ुद को थामना,
ख़ुद को स्वीकार करना।

8 thoughts on “नियति से बहस नहीं

  1. Khud ko logo ki sewa me samparit karna hi jindgi ka safal hona hai
    Tumare bhitar jan sewa kut kut kar bhari hai
    Sundar lekhni aise hi likhti raho

    1. Beautiful, very thought provoking and the ultimate truth. Self realisation is really great to face life & its challenges.
      Well written & expressed.
      God bless

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